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शक्ति चेतना मंत्र

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माता भगवती दुर्गा जी की साधना का प्रथम क्रम

मुर्झाये जीवनों में जान डाल देने वाला

शक्ति चेतना मंत्र

( ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः )

 

परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज

 

माता आदिशक्ति जगत् जननी भगवती दुर्गा जी ने इस ब्रह्माण्ड की रचना अभूतपूर्व ढंग से की है। अनन्त ग्रहों एवं नक्षत्रों की रचना और उनमें संतुलन, आश्चर्य में डाल देने वाला है। मनुष्य जीवन की रचना प्रकृतिसत्ता की शक्ति व कारीगरी का पूर्ण नमूना है। इस विशाल ब्रह्माण्ड की पूर्णता को समेटकर एक छोटे से मनुष्य की काया में भर देने की कारीगरी को देखकर बरबस माता भगवती दुर्गा जी की योगमाया की पूर्णता व विलक्षणता का भान होता है।
हमारे इस शरीर में पूर्ण ब्रह्माण्ड व मूलसत्ता समाहित है। मनुष्य यदि अपने अन्दर की क्षमता को देख सके, पहचान सके और उसका उपयोग कर सके, तो वह पूर्ण प्रकृति से एकाकार हो सकता है, प्रकृतिमय बन सकता है। यह क्षमता केवल मनुष्य में ही समाहित है, अन्य जीवों में नहीं। हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने अपने अन्दर की क्षमता को अनेकों माध्यमों का उपयोग करके देखा, पहचाना है व जाग्रत् किया है। वर्तमान में मनुष्य जिस स्थिति में है, वैसा पहले नहीं था। सृष्टि के निर्माण के समय मनुष्य पूर्ण जाग्रत् था, हर पल प्रकृति से एकाकार था। मगर, समय के साथ उसके भोगवादी स्वभाव ने उसके ही कर्मों से उसकी चेतना में कुकर्मों के इतने आवरण चढ़ा दिये कि उसकी मूल चेतना गहराई में डूब गई, जबकि सब कुछ उसके शरीर में आज भी उसी प्रकार है, जैसे पहले था। मगर, अब उस पर आवरण की अनेक परतें छा चुकी हैं। जिस प्रकार यदि प्रकाश दे रहे विद्युत् बल्ब के ऊपर मिट्टी का आवरण चढ़ जाये, तो फिर वह बल्ब अन्दर तो उसी प्रकार जलता रहेगा, लेकिन बाहर प्रकाश नहीं फेंक सकेगा। उसी प्रकार मनुष्य के अन्दर आज भी प्रकृति से एकाकार होने की पूर्ण क्षमता मौजूद है, मगर आवरणों को हटाने की आवश्यकता है और इन कुकर्मों के आवरणों को सत्कर्मों के माध्यम से ही हटाया जा सकता है। आज उन जाग्रत् चैतन्य ऋषि-मुनियों के बताये मार्ग्रों, सत्कर्मों एवं क्रियाओं को अपनाना होगा।
हमारे अग्रज ऋषि-मुनियों ने हमें अनेक मार्ग व क्रियायें बताई हैं, जैसे शुद्धता रखना, सात्त्विक  भोजन करना, व्रत रखना और योग आदि। उसी क्रम में उन्होंने महत्त्वपूर्ण क्रम प्रदान किया है, मंत्रों का जाप। मंत्र का एक-एक अक्षर प्रकृति व मनुष्य की ग्रंथियों से एकाकार है। प्रकृति में उच्चारित हर शब्द मंत्रमय है। हर शब्द का हमारे शरीर पर किसी न किसी रूप में प्रभाव पड़ता ही है। उन्हीं शब्दों का चयन करके हमारे ऋषियों-मुनियां ने प्रत्येक क्षेत्र का कार्य करने, अपने शरीर पर प्रभाव डालने तथा जड़ चेतना को जाग्रत करने के लिए अलग-अलग मंत्रों की रचना की है। उन्हीं मंत्रों में एक है यह अति विशिष्ट मंत्र ‘‘ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः।‘‘
वर्तमान कलियुगी वातावरण से पर्यावरण प्रदूषित हो चुका है। मनुष्यों की सम्पूर्ण शारीरिक चेतना जड़ पड़ चुकी है और वह शक्तिहीन बन गया है। इस समय केवल यही उपर्युक्त मंत्र मनुष्य को चेतनावान् बना सकता है और प्रकृति से एकाकार करने वाली ग्रंथियों की जड़ता दूर कर सकता है। अगर आप अपनी जड़ता को इस मंत्र के माध्यम से दूर करने में सफल हो जाते हैं, तो आगे का आपका मार्ग या कोई भी आध्यात्मिक क्रियायें व मंत्रजप फलप्रद होने लगेंगे।

इस मंत्र की विशेषताएं

1. यह मंत्र माता आदिशक्ति जगत् जननी भगवती दुर्गा जी का पूर्ण चेतना मंत्र है।
2.  यह पूर्ण उत्कीलित है। कोई भी व्यक्ति इसका जाप कर सकता है।
3.  इसका जाप शुद्धता-अशुद्धता, किसी भी स्थिति में मानसिक रूप से किया जा सकता है।
4.  यह मंत्र माता भगवती दुर्गा जी की प्रीति व कृपा प्राप्त करने में पूर्ण सहायक है।
5.  इसका जाप एक आसन में बैठकर शुद्धता से करने पर कई गुना फल प्राप्त होता है।
6.  इसका सवा लाख जप कर लेने पर इसकी ऊर्जा पूर्णता से कार्य करने लगती है।
7.  इस मंत्र के 24 लाख जप करने वाले के शरीर की शक्ति (चेतना) जाग्रत् होने लगती है। अनेकों
अनुभूतियों का एहसास होने के साथ ही माता भगवती की पूर्ण प्रीति व कृपा प्राप्त होती है। उसके अनेकों रुके कार्य स्वाभाविक गति से सम्पन्न होने लगते हैं।
8.  इस मंत्र के 24 लाख के 24 अनुष्ठान पूर्ण करने पर यह पूर्ण सिद्ध हो जाता है। फिर किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए यदि मंत्र का जाप करके कामना की जाए, तो वह पूर्ण होता है। कई बार माता के दर्शन की झलकियां भी प्राप्त हो जाती हैं। मनुष्य के अन्दर देवत्व का उदय होने लगता है तथा उसकी पूर्ण कुण्डलनी चेतना में स्पन्दन होने लगता है। उसके बाद मनुष्य इस मंत्र का जितना जाप करता जाता है, उसकी चेतना उतनी ही जाग्रत् होती चली जाती है और वह प्रकृति की उतनी ही नजदीकता महसूस करता चला जाता है। उसकी कुण्डलिनी जाग्रत् होती चली जाती है और अनुभूतियां बढ़ती जाती हैं।
आगे गुरु मार्ग पर चलना हितकर होता है, अन्यथा शक्ति के प्रवाह का भटकाव भी आ जाता है। इसी मंत्र के अन्त में ‘‘स्वाहा‘‘ शब्द लगाकर पवित्र अग्नि में हवन भी किया जा सकता है। हवन बाजार में उपलब्ध होने वाली हवन सामग्री से या किसी भी निर्मित पवित्र हवन सामग्री से स्वयं किया जा सकता है।
मंत्र जाप करने पर हवन करना जरूरी नहीं है। मगर यदि हवन भी कुछ कर लिया जाता है, तो और भी अच्छा है। वैसे तो मंत्र जप में दशांश हवन करने का विधान है, मगर जो किया जा सके, उतना ही पर्याप्त है।
मंत्र जाप करते समय माता भगवती दुर्गा जी के किसी भी ममतामयी स्वरूप का चिंतन किया जा सकता है तथा माँ की किसी भी छवि या मूर्ति का पूजन किया जा सकता है। इस मंत्र का जाप स्त्री, पुरुष, बच्चे व बूढ़े सभी कर सकते हैं। वैसे तो मंत्र जाप जितना ज्यादा हो सके, करते रहना चाहिए। नित्य निर्धारित मंत्र जप करने की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। मंत्र जाप माला के द्वारा या बिना माला के भी किया जा सकता है। दोनों का फल बराबर है। निर्धारित मंत्र जाप के लिए माला का उपयोग कर सकते हैं। जाप रुद्राक्ष, तुलसी, स्फटिक, मूंगा, कमलगट्टे या अकीक की माला से कर सकते हैं। जाप करने वाले को सात्त्विक आहार करना चाहिए। मांस-मदिरा या अन्य नशों के सेवन करने वाले को मंत्र जाप का पूर्ण फल नहीं प्राप्त हो पाता है।
यदि अनुष्ठान लगातार पूरे समय सम्पन्न करने का क्रम चल रहा हो, तब ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना आवश्यक है, सामान्य नित्य के जाप में आवश्यक नहीं। मगर, सन्तुलित जीवन व अच्छे आचरण का पालन करना फलप्रद होता है।
इस मंत्र के जाप से अब तक समाज के लाखों लोगों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन प्राप्त किया है तथा अनेकों संकटों से मुक्ति प्राप्त की है। अनेक भक्तों ने तो इसके माध्यम से महाशक्तियज्ञों में माता भगवती दुर्गा जी की झलकियां प्राप्त की हैं और अनेकों प्रकार की अनुभूतियों को प्राप्त किया है। इस मंत्र जाप के प्रभाव से अनेकों लोगों ने अपने अवगुणों एवं गलत आचरणों से मुक्ति प्राप्त की है। इस मंत्र का सदैव जाप करने वाले के जीवन में आने वाले विघ्नों का हरण होता है। मनुष्य सदैव माता की कृपा का एहसास करता रहता है।

जय गुरुवर की !       जय माता की !