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गुरुवार व्रत महात्म

Written by Siddhashram Dhaam on .

गुरुवार व्रत महात्म

 

 

जिस प्रकार इस धरती पर सभी नदियों में गंगा नदी सबसे अधिक फल प्रदान करने वाली पवित्र नदी है, जिसकी तुलना अन्य नदी से की ही नहीं जा सकती, इसी प्रकार हिन्दू धर्म में वर्णित सभी व्रतों में गुरुवार व्रत सबसे अधिक भौतिक एवं आध्यात्मिक फल प्रदान करने वाला है। गुरुवार व्रत की तुलना किसी अन्य व्रत से की ही नहीं जा सकती। मानव जीवन के लिये यह पारस के समान है।
हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है तथा आदिकाल से अलग-अलग समुदाय-सम्प्रदायों के द्वारा अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा, अर्चना एवं उपासना होती चली आ रही है। इसके साथ ही समय-समय पर अलग-अलग व्रत-उपवासों का क्रम प्रचलन में रहा है। मगर, हर काल में जिस व्रत का महत्त्व ऋषियों-मुनियों ने सबसे अधिक बताया है, वह है गुरुवार का व्रत। गुरुवार को वीरवार व बृहस्पतिवार के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। वर्तमान में लोग अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए नाना प्रकार के व्रत रखते हैं। कुछ लोग एक साथ कई प्रकार के व्रत रखते हैं, मगर फिर भी उन्हें किसी क्षेत्र का कोई विशेष लाभ नहीं मिल पाता है। उल्टे, उन्हें कई व्रतों का विपरीत परिणाम भुगतना पड़ता है। वर्तमान समय में तो व्रतों के नाम पर इतने आडम्बर, दिखावा व नियम जुड़ गये हैं कि उनका वास्तविक स्वरूप व लक्ष्य ही भटक गया है। हम व्रत क्यों और किसलिए रखते हैं ? लोगों को अपनी समस्याओं के निदान के लिए जिसने जो बता दिया, जिस तरह बता दिया, उसी प्रकार लोग व्रत रहने लगते हैं। सभी व्रतों का क्रम अलग-अलग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने से जुड़ा रहता है। लोग कभी किसी देवी का व्रत रखते हैं, तो कभी किसी देवता का। इसी उठा-पटक में उनका पूरा जीवन व्यतीत हो जाता है। वे पूर्ण संतुष्टि से निर्णय ही नहीं कर पाते कि उन्हें कौन सा व्रत रहना चाहिए व कौन सा व्रत उनके लिए कल्याणकारी है ? माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी जन-जन की जननी हैं, सभी देवी-देवताओं द्वारा पूजित प्रकृति की मूल सत्ता हैं और जन-जन की मूल इष्ट हैं। उनकी पूजा-आरती करने से तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा एक साथ स्वतः हो जाती है। ठीक उसी प्रकार गुरुवार व्रत रखने से सभी व्रतों का फल अपने आप मिल जाता है, अन्य कोई व्रत रखने की जरूरत नहीं पड़ती।
गुरुवार व्रत रखने से सभी देवी-देवताओं का एक साथ आशीर्वाद प्राप्त होता है, गुरुसत्ता का पूर्ण आशीर्वाद मिलता है एवं माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी प्रसन्न होती हैं तथा अपना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करती हैं, जिससे जीवन में पूर्णता आती है, आत्मशान्ति मिलती है तथा मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है।

गुरुवार व्रत में भ्रान्तियां
गुरुवार व्रत के विषय में आजकल लोगों में अनेकों भ्रान्तियां व्याप्त हैं।

1. कुछ लोग सोचते हैं कि गुरुवार व्रत केवल गुरु के लिए रखा जाता है, किसी देवी-देवता के लिए नहीं। यह धारणा पूर्णतया गलत है। गुरुवार व्रत केवल गुरु के लिए नहीं होता। यह तो वह मूल दिन है, जो ज्ञान सत्ता के लिए होता है, माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी के लिए होता है। गुरु का तो अपना कुछ अस्तित्व होता ही नहीं है। उसे तो प्रकृतिसत्ता हम लोगों के कल्याण के लिए अपने प्रतिनिधिस्वरूप भेजती है। यदि हम गुरुसत्ता को पूर्णता से समझ जायंे, गुरु को पूर्णता से आत्मसात् कर लें, अगर हम गुरु के ज्ञान से एकाकार करने में सफलता प्राप्त कर लें, तो हम यह जान पायेंगे कि हमारे सामने हमारा गुरु नहीं, साक्षात् माता भगवती दुर्गा जी ही हैं। अतः गुरुवार का व्रत तो अप्रत्यक्ष रूप से साक्षात् माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी के लिए रखा जाता है। उस दिन गुरु व माता भगवती दुर्गा जी दोनों का पूजन-चिंतन किया जाता है।
2, व्रत के नियम में धारणा है कि गुरुवार के व्रत में पीले वस्त्र पहनने चाहिये व पीला भोजन करना चाहिए। ऐसा कुछ भी नहीं है। न पीले वस्त्र आवश्यक हैं और न ही पीले रंग का भोजन। साधनात्मक दृष्टि से पीले वस्त्र तो सदैव फलप्रद व आत्मशान्ति प्रदान करने वाले होते हैं। इस प्रकार की अनेकों भ्रांतियां हैं, जिनमें आपको उलझने की जरूरत नहीं है। आपको केवल उन नियमों को अपनाने की जरूरत है, जो जरूरी हैं व जिनका फल मिलता है।

गुरुवार व्रत के नियम
गुरुवार व्रत रखने के लिए बहुत ज्यादा विधि-विधान की जरूरत नहीं है। इस व्रत को प्रत्येक स्त्री-पुरुष तथा बालक व बालिकायें सभी रख सकते हैं। यह व्रत सप्ताह में एक बार पड़ता है। गुरुवार व्रत में कम से कम निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
1. इस व्रत को बुधवार व गुरुवार की मध्यरात्रि, अर्थात् 12 बजे रात्रि से प्रारम्भ मानना चाहिए।
2. इस व्रत को सूर्यास्त तक मानना चाहिए।
3. गुरुवार को प्रातः उठकर नित्यक्रिया व स्नान आदि करके स्वच्छ धुले वस्त्र धारण करके, पूजा कक्ष में बैठकर अपने गुरु व इष्ट देवी-देवताओं के पूजन के साथ माता भगवती दुर्गा जी का पूजन व आरती वन्दन करें तथा अपनी क्षमतानुसार शांति से बैठकर गुरु व माता दुर्गा जी के मंत्रों का जाप व ध्यान-चिंतन करें ।
4. यदि शुद्ध घी हो, तो उसकी ज्योति जलाकर आरती करें, अन्यथा सरसों, राई आदि के तेल का उपयोग करके भी ज्योति जला सकते हैं। तेल भी उपलब्ध न होने पर केवल अगरबत्ती जलाकर आरती कर सकते हैं। यदि कुछ भी उपलब्ध न हो, तो पूर्ण भावना के साथ बिना दीप-धूप के भी मानसिक आरती कर सकते हैं।
5. उस दिन पूर्ण सात्त्विकता से माता भगवती दुर्गा जी व गुरु के ध्यान-चिन्तन में रहें।
6. पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
7. दिन में आवश्यकतानुसार थोड़ा फलाहार या दूध-चाय आदि ले सकते हैं, मगर नमक आदि का सेवन न करें।
8. तम्बाकू, धूम्रपान, शराब या अन्य किसी भी तरह का नशा आदि न करें।
9. दिन डूबने के बाद से रात्रि तक समयानुसार पुनः माता भगवती दुर्गा जी व गुरु का पूजन, आरती तथा मंत्र जाप करें। सुविधानुसार नारियल, रेवड़ीदाना या अन्य प्रसाद माँ के चरणों में चढ़ाकर लोगों में बांटें। उसके बाद घर में जो भी शुद्ध सात्त्विक (लहसुन-प्याजरहित) भोजन (दाल, चावल, सब्जी, रोटी आदि) बना हो, उसे ग्रहण कर सकते हैं। सायंकाल की आरती-पूजन हो जाने के बाद भोजन में नमक खा सकते हैं। 
10. किसी गुरुवार को यदि आप घर से बाहर रहें, तब भी दिन में व्रत रहें तथा सूर्यास्त हो जाने के बाद एक समय जो भी शुद्ध सात्त्विक भोजन मिले, खा सकते हैं।
11. आप अपनी जानकारी के अनुसार माता भगवती की आराधना-पूजन कर सकते हैं। जिन मंत्रों का जाप करते हों, उन्हीं का जाप करें। यदि आपको दुर्गा जी के किसी भी मंत्र का ज्ञान नहीं है, तो माता के चेेतना मंत्र ’’ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः’’ का अधिक से अधिक जाप करें। यह मंत्र माता की पूर्ण कृपा व आशीर्वाद दिलाने में सक्षम है। गुरुवार के दिन एक बात का विशेष ध्यान रखें कि आपके आज्ञाचक्र (मस्तक) पर कुंकुम का तिलक अवश्य लगा हो। वैसे तो कुंकुम का तिलक नित्य ही लगाना फलप्रद होता है।

गुरुवार व्रत के लाभ
गुरुवार व्रत रखने के अनगिनत लाभ हैं। यदि कहा जाय कि इससे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त की जा सकती है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। फिर भी यहां पर कुछ प्रमुख लाभों की जानकारी दी जा रही है:
1. केवल गुरुवार व्रत ही आपको आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों क्षेत्रों का पूर्ण फल प्रदान करने वाला है।
2. इससे माता भगवती दुर्गा जी की पूर्ण कृपा व आशीर्वाद मिलने के साथ ही गुरु का भी पूर्ण आशीर्वाद व कृपा प्राप्त होती है।
3. इस व्रत को रखने के उपरान्त अन्य कोई और व्रत रखने की जरूरत नहीं पड़ती है। सभी व्रतों का फल एक साथ केवल गुरुवार व्रत रखने से मिल जाता है, जबकि अन्य व्रत रखने से गुरुवार व्रत का फल प्राप्त नहीं किया जा सकता।
4. इससे घर में सुख-शान्ति व सम्पन्नता आती है।
5. इससे जीवन में आरोग्यता (रोग मुक्ति) प्राप्त होती है।
6. इससे ही जीवन में आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होती है।
7. लगातार गुरुवार व्रत रखकर तथा माता के मंत्रों का जाप करके अपनी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है।
8. गुरुवार व्रत रहने वाले व्यक्ति को शत्रुओं का भय नहीं रहता तथा शत्रु बलवान् होने पर भी अहित नहीं कर पाता।
9. इससे इन्द्रियां स्वयं संयमित होने लगती हैं तथा विषय-विकारों व अवगुणों से मुक्ति मिलती है।
10. लड़के व लड़कियां यदि शादी के पहले से गुरुवार व्रत रखते हैं, तो उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
11. गुरुवार व्रत रखने वाले व्यक्ति के ऊपर जादू-टोना या भूत-प्रेत का प्रभाव नहीं पड़ता है।
12. जीवनपर्यन्त गुरुवार व्रत रखने वाला व्यक्ति मृत्यु के बाद नारकीय जीवन नहीं प्राप्त करता, बल्कि उसे मुक्ति का मार्ग व स्वर्गीय जीवन की प्राप्ति होती है।
13. गुरुवार व्रत रखने वाले व्यक्ति की आंतरिक चेतना धीरे-धीरे जाग्रत् होती है, जिससे उसमें वाक्शक्ति का प्रादुर्भाव होने लगता है।
14. इस व्रत को नियमपूर्वक रहने वाले व्यक्ति के संस्कार इतने जाग्रत् हो जाते हैं कि वह जरूरत पड़ने पर किसी दूसरे व्यक्ति की शारीरिक तकलीफों को अपने हाथ के स्पर्श द्वारा काफी कुछ ठीक कर सकता है।
उपर्युक्त लाभों के अलावा गुरुवार व्रत रहने वाले व्यक्ति को अनेकों अन्य लाभ प्राप्त होते हैं। सप्ताह में एक दिन का व्रत हो जाने के बाद शारीरिक क्रम बराबर संतुलित बना रहता है और कम से कम एक दिन पूर्ण आध्यात्मिक चिंतन में निकल जाता है। परिवार में छोटे-छोटे बच्चों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है तथा घर में पूर्ण धार्मिकता का क्रम बना रहता है।

जय गुरुवर की !        जय माता की !