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युग परिवर्तन का महाशंखनाद, सिद्धाश्रम

Written by siddhashramdhaam on .

युग परिवर्तन का महाशंखनाद

22,23,24 अक्टूबर 2012

सिद्धाश्रम शिविर में हुआ लाखों भक्तों का समागम

 प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर श्री पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में शक्ति चेतना जनजागरण शिविर का आयोजन किया गया। इससे पूर्व दिल्ली तथा सागर (म.प्र.) में आयोजित दोनों शिविरों में परम पूज्य सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने युग परिवर्तन का शंखनाद किया था। चूँकि 22, 23, 24 अक्टूबर 2012 की अवधि में आयोजित यह शिविर अपने आपमें अति विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण है, अतः इसे युग परिवर्तन का महाशंखनाद नाम दिया गया। शंखनाद तो आगामी सभी शिविरों में भी होते रहेंगे, किन्तु यह शिविर इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। ऐसा महाशंखनाद न तो कभी हुआ है और न ही भविष्य में कभी होगा।

अनीति-अन्याय-अधर्म के नाश और सत्यधर्म की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से जनसामान्य में शक्ति चेतना जाग्रत् करने हेतु होने वाले इस शिविर के लिए भगवती मानव कल्याण संगठन के कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्र में पैम्फ्लैट्स वितरित करके महीनों पहले से खूब प्रचार किया था। देश-विदेश स्तर पर आरतियों, महाआरतियों एवं अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ के आयोजन के माध्यम से भी प्रचार हुआ था। आश्रम की ओर आने वाले मुख्य मार्गों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए थे। इसके साथ-साथ चौपहिया वाहनों पर फ्लैक्स लगाकर ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में ध्वनिविस्तारक यंत्रों के द्वारा भी शिविर की घोषणा कराई गई थी। इस प्रकार, इस शिविर का देश-विदेश में व्यापक प्रचार हुआ था।

इसके फलस्वरूप, सेवा-श्रमदान का कार्य करने वाले अनेक लोग तो नवरात्र प्रारम्भ होने से एक दिन पूर्व ही 15 अक्टूबर को पहुंच गए थे। इन्होंने पूरे नवरात्र की अवधि आश्रम में सेवा-साधना करते हुये बिताई। शिविरार्थियों के आने का सिलसिला, वास्तव में, 20 अक्टूबर से प्रारम्भ हुआ। उसके बाद, अगले दिन से 22 अक्टूबर को शिविर प्रारम्भ होने तक आगन्तुकों का अबाध प्रवाह चला। कई हजार लोग तो अगले दिन भी आए। अनेक लोग चार्टर्ड बसों, निजी कारों और टैक्सियों से भी आश्रम पहुंचे। पार्किंग स्थल का दृश्य दिल्ली के किसी अन्तरराज्यीय बस अड्डे से कम नहीं था। ऐसा लग रहा था कि यह उमड़ता जनसैलाब सारी व्यवस्थाएं ठप्प कर देगा, किन्तु गुरुकृपा से सभी व्यवस्थाएं सुचारु रूप से पूर्ण हुईं।

शिविर पण्डाल गत वर्षों की अपेक्षा ड्यौढ़े आकार का लगाया गया था, किन्तु कार्यक्रम के समय प्रतिदिन वह खचाखच भर जाता था और उससे अधिक लोग उसके बाहर बैठकर या खड़े-खड़े ही गुरुवरश्री की अमृतवाणी का रसपान करते थे। प्रवचन समाप्त होने के बाद और पहले सम्पूर्ण आश्रम परिसर मानवता का महासागर हिलोरें मारता प्रतीत होता था।

आवासीय पण्डाल भी अपर्याप्त ही रहे। इस कारण अनेक लोगों ने खुले आकाश के नीचे कंकड़ों-पत्थरों पर ही लेटकर रात्रिविश्राम किया। किन्तु, आनन्द की बात यह थी कि किसी के चेहरे पर भी तनाव की रेखा तक नहीं थी और न ही किसी ने इस विषय में कोई शिकायत ही की। लग रहा था, जैसे सभी आनन्दपूर्वक माँ के आंचल में लेटे हों। स्नानागारों में भीड़ हो जाने के कारण अधिकतर लोगों ने पापविमोचिनी समधिन शक्ति सरिता में स्नान का आनन्द लिया। आश्रम से नदी तक आने-जाने वालों और नदी के दोनों तटों पर स्नान करने वालों को देखकर महाकुम्भ का अहसास होता था। 

भोजन व्यवस्था बड़े ही सुचारु रूप से चली। लाखों भक्तों ने निरूशुल्क माँ अन्नपूर्णा भण्डारे का महाप्रसाद प्राप्त किया।

प्रतिदिन शिविर पण्डाल में प्रातः 07 से 09 बजे तक मंत्र जाप एवं ध्यान-साधना का क्रम चलता रहा तथा अपराह्न दो से तीन बजे तक भावगीतों का कार्यक्रम रहता था। तदुपरान्त, माँ-गुरुवर के जयकारे लगाए जाते थे। इसी बीच परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् का शुभागमन होता था। शक्तिस्वरूपा तीनों बहनों पूजा, संध्या एवं ज्योति योगभारती के द्वारा उनके पदप्रक्षालन एवं वन्दन के उपरान्त उनकी अमृतवाणी सुनने को मिलती थी। परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् के दिव्य उद्बोधन के उपरान्त दिव्य आरती होती थी। इसका नेतृत्व शक्तिस्वरूपा तीनों बहनों पूजा, संध्या एवं ज्योति योगभारती के द्वारा किया जाता था। तत्पश्चात, महाराजश्री की चरणपादुकाओं का स्पर्श करके सभी प्रसाद प्राप्त करते थे। गुरुवरश्री मंच पर तब तक विराजमान रहते थे, जब तक समस्त उपस्थित जन प्रणाम नहीं कर लेते थे।

उद्बोधन-प्रथम दिवस

माँ के साधक नवरात्र के सभी पलों का उपयोग करने का प्रयास करते है। वह हरपल अपने भक्तों पर कृपा बरसाती रहती हैं। माँ की आराधना से सहज और सरल और कोई आराधना नहीं है। किन्तु, लोगों को भ्रम है कि गलती होने पर दण्ड मिलेगा। वास्तविकता यह है कि अज्ञानतावश बड़े अपराध होने पर भी माँ सदैव क्षमा करती रहती है।

मैं और माँ में सृष्टि का सब कुछ छुपा है। भौतिक जगत् का मैं नहीं, हमारा मूलस्वरूप मैं। माँ हमारी आत्मा की जननी हैं, किन्तु हम उन्हें जानने का प्रयास नहीं करते।

एक तड़प होनी चाहिये कि मुझे अपने आपको जानना है और अपनी जननी को जानना है। माँ से सौदबाजी मत करो। उससे कुछ मांगने की जरूरत नहीं है। वह सब कुछ जानती हैं कि हमें क्या चाहिये? यदि कुछ मांगना ही है, तो भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति की कामना करो। माँ सब कुछ समझती हैं, पर हम उन्हें नहीं समझ पा रहे। बस यही अन्तर है।

जीवन विचारों पर चलता है। जैसे विचार होंगे, वैसा व्यवहार होगा। अपनी सोच को बदलो और माँ को जानने का प्रयास करो। हमें उसके विधान के अनुसार चलकर जीवन जीना चाहिये। तुम ऋषि-मुनियों की सन्तान हो। आपके भीतर सारी सामर्थ्य समाहित है। तुम्हारे अन्दर अलौकिक क्षमताएं हैं। अपनी शक्ति को याद करो। तुम अपने आपको पहचानना नहीं चाहते। अपने मैं को जानना नहीं चाहते। एक विचारधारा तुम्हारे जीवन को बदलकर रख सकती है।

माँ का विधान व्यवस्थित विधान है। यह सन्देह से परे है। उसने कर्म का विधान बनाया है। हर व्यक्ति जाने-अनजाने कर्म कर रहा है। वह कर्म करने के लिए बाध्य है। हमें हर कर्म विवेकपूर्वक करना चाहिये। अपने तमोगुण एवं रजोगुण को सतोगुण के अधीन करो। विचार करने मात्र से हमारे अन्दर परिवर्तन आता है। मनुष्य यदि पूर्णत्व प्राप्त कर ले, तो अपने स्वरूप के समान अनेक स्वरूप उत्पन्न कर सकता है।

धन-सम्पत्ति का सुख आपको सत्यपथ से विचलित कर रहा है। यही सब समस्याओं और दुःखों का कारण है। इसी कारण तुम संसार के झंझावातों में उलझकर रह गए हो। अतः अपनी संकल्प शक्ति को सशक्त बनाओ। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि हर अनुष्ठान से पूर्व संकल्प ही कराते थे। हमारे अन्दर हर पल सजगता होनी चाहिये कि हम भूलकर भी सत्यपथ से भटकें नहीं। नास्तिक, आलसी एवं कर्महीन लोगों का कल्याण कर पाना बड़ा कठिन है।

अपनी गहराई में डूबकर अपनी अच्छाइयों को पहचानों और सदैव सन्तुलित रहो। इससे तुम कभी भी विचलित नहीं होगे। इस बात पर सदैव विश्वास रखो कि सत्य कभी भी पराजित नहीं होता।

हर कर्म का फल तुम्हें भोगना ही पड़ेगा, कर्म अच्छा हो या बुरा। परमसत्ता को क्यों दोष देते हो? भौतिक जगत् के माँ-बाप भी बच्चों को दण्डित करते हैं। इसी प्रकार माँ के विधान में भी दण्ड का प्रावधान है। कर्म के विधान पर विश्वास करोगे, तो अधर्म तुमसे दूर भागता चला जाएगा। मात्र जयकारे लगाने और माँ के मन्दिर में नारियल फोडऩे से कुछ भी होने वाला नहीं है। इसलिए अपने आपको बदलो।

माँ से आशीर्वाद लेकर भिखारियों का जीवन मत जिओ। मुझसे भी कुछ मत मांगो। केवल मेरे बताए मार्ग पर चलो। यहां पर विश्व की समस्त शक्तियां झुकने को बाध्य होंगी। नवरात्र की अष्टमी-नवमी-दशमी को यहां विश्व के समस्त तीर्थ और शक्तियां उपस्थित होती हैं।

सबसे पहला शंखनाद 12-13 नवम्बर 2011 को दिल्ली में हुआ था। वहां पर मैंने समस्त मठाधीशों के सामने अपने तपबल की चुनौती रखी थी। आने वाले एक वर्ष का समय और देता हूँ। यदि कोई मठाधीश मेरे तपबल को पराजित कर देगा, तो मैं अपना सर्वस्व उसको समर्पित करके उसका सेवक बन जाऊंगा। सभी धर्माचार्यों का सत्यपरीक्षण होना चाहिये, क्योंकि वे सब ठहर चुके हैं और ठहरा हुआ जल दूषित हो जाता है। दस-दस, बीस-बीस साल तक मन्दिर में आरती-पूजन करके भी उनमें विश्वास का अभाव है कि कभी भगवान् के दर्शन होंगे।

किसी उपयुक्त स्थान पर एक विश्वस्तरीय सम्मेलन होना चाहिये, जहां पर विश्व के समस्त धर्मगुरु, प्रमुख राजनेता और मीडिया के लोग उपस्थित हों। वैज्ञानिक यंत्रों के द्वारा सबके सामने यह पता किया जाना चाहिये कि कौन ध्यान-समधि में जा सकता है? किसने अपना सूक्ष्मशरीर जाग्रत् करके कारणशरीर प्राप्त किया है? किसकी पूर्ण कुण्डलिनी चेतना जाग्रत् है? कौन कठिन से कठिन कार्य को अपने तपबल के माध्यम कर सकता है? और किसने सृष्टि की रचयिता परमसत्ता के दर्शन प्राप्त करके उससे एकाकार किया है? जब तक सत्यपरीक्षण नहीं होता, ये धर्म के लुटेरे समाज को ही लूटते रहेंगे।

मैं माँ की कृपा पाकर लोगों को बांट रहा हूँ। पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम कोई सामान्य धाम नहीं है। किसी समय यह अंधियारी वन था। यहां पर दिन में भी आने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। आज यहां पर कितनी चेतनता है!

आज धार्मिक आयोजनों में और कथा-वार्ताओं में नाच-गाने होते हैं। इस प्रकार के उत्सव मनाना धर्म का कर्तव्य नहीं है। सच्चा साधक ही इस बात को समझ सकता है। स्थूल के सुख में मत खोओ। सूक्ष्म के आनन्द को पीना सीखो। मेरा धर्म और कर्तव्य है कि मैं गलत मार्ग पर चलने वालों को सही दिशा दूं, नहीं तो कौन दिशा देगा? मुझे प्रसन्नता होती है कि मेरे शिष्य सही दिशा में बढ़ रहे हैं।

आप लोग नित्य दर्पण देखते हैं, किन्तु स्वयं को दर्पण नहीं बनाते। किसी दर्पण के यदि टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायें, तो उसका हर टुकड़ा दर्पण बन जाता है। परमसत्ता कण-कण में मौजूद है और आपका गुरु भी कण-कण में मौजूद है। यहां पर आकर लोग स्थायी लाभ प्राप्त करते हैं। कई लोगों ने आसाध्य रोगों से मुक्ति पाई है। विश्वास करना सीखो। अपने तन-मन-धन को शुद्ध करो, नहीं तो तुम्हारी समस्याएं बढ़ती जाएंगी। पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त एवं चरित्रवान् बनो। मैं स्वयं ऐसा जीवन जीता हूँ।

मैं चाहता हूँ कि आपके द्वारा दिया जा रहा मान-सम्मान आप तक ही रहे। मैं भौतिक जगत् के मान-सम्मान को पैर से ठोकर मारता हूँ। मैंने अपने शिष्यों को आत्मकल्याण-जनकल्याण से जोड़ा है। विषमता को दूर करो। सभी से मित्रता का व्यवहार करो। शत्रुता केवल अनीति-अन्याय-अधर्म से होनी चाहिये।

आज हजारों-हजार रावण हर देश में विद्यमान हैं। उनकी अन्तरात्मा मर चुकी है। राजनेता लोग अपने मंच पर उनका सम्मान करते हैं। क्या हम इसे अपनी आंखों से देखते रहें? याद रखो, पाप करने वाला तो पापी होता ही है, उसे देखने वाला भी पापी होता है। इसलिए पाप करने वालों के खिलाफ आवाज उठाओ। खुला धर्मयुद्ध लड़ो और विजय प्राप्त करो।

आज बेईमान-धूर्त राजनेताओं ने लूट मचा रखी है। ये लोग विवाह-शादियों में करोड़ों रुपये लुटा देते हैं, जब कि गरीब लोग दो वक्त का भोजन नहीं जुटा पाते। ऐसे दस-बारह हजार लोग देश को वश में किये बैठे हैं। जब साधना में बैठो, तो माँ से प्रार्थना करो कि ऐसे भ्रष्ट नेता घातक से घातक बीमारियों के शिकार हों, दुर्घटनाग्रस्त हों और आपस में लड़ें।

आए दिन 90 प्रतिशत लोग आपको लूटते रहते हैं। यदि लुटते रहोगे, तो माँ की कृपा कैसे प्राप्त करोगे? इसीलिए, अनीति-अन्याय-अधर्म के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़ो। मैं उसी के लिए आपको तैयार कर रहा हूँ। अधर्मी-अन्यायियों की बुराइयों को हम बिना किसी रक्तपात के अपनी चेतना के बल पर नष्ट करेंगे।

हाथ उठाकर संकल्प लो- पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त एवं चरित्रवान् जीवन जियेंगे। विवाहपूर्व ब्रह्मचर्य और विवाहोपरान्त एक पति/एक पत्नी व्रत का पालन करेंगे। मैंने स्वयं को इसमें ढाला है। मैंने भी गृहस्थ में प्रवेश किया और तीन पुत्रियां उत्पन्न होने के उपरान्त मन-वचन-कर्म से सपत्नीक ब्रह्मचर्य का पालन करता हूँ। आप लोग भी सन्तानोत्पति के उपरान्त सन्तुलन का जीवन जियें।

आज मैं अपने द्वारा अब तक सम्पन्न किये गये समस्त आठ महाशक्तियज्ञों की ऊर्जा को संकल्प लेकर आप लोगों को प्रदान करता हूँ। यदि तुम संकल्प लेते हो, तो तुम्हारे जीवन में परिवर्तन आता चला जाएगा। (सबने हाथ उठाकर संकल्प लिया।)

हम बदलेंगे, जग बदलेगा- इसे सार्थक करना है। यदि भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति की कामना करोगे और यही मांगोगे, तो इसी से परमसत्ता से जुड़े रहोगे। इससे नेत्रहीन रहकर भी माँ की कृपा प्राप्त करते रह सकते हैं।

इस आश्रम में मेरे द्वारा नवम्बर से फरवरी तक प्रतिवर्ष निरूशुल्क योग सिखाया जाता है। यहां पर भोजन और आवास व्यवस्था सदैव निरूशुल्क रहती है। मैं दूसरे योगगुरुओं की तरह लोगों को लूटता नहीं हूँ।

माँ से सदैव प्रार्थना करो कि दुनिया के समस्त अन्यायी-अधर्मी आकर भगवती मानव कल्याण संगठन से टकराएं। उसमें मेरे प्राण बसते हैं। साधनात्मक चेतना तरंगों का ही प्रभाव है कि यहाँ प्रतिदिन सैकड़ों लोग मुझसे मिलने आते हैं और कहते हैं कि गुरुजी, हम शराब छोडऩा चाहते हैं।

देश-विदेश में आजकल माँ का गुणगान गूंज रहा है। डूब जाओ माँ की भक्ति में। आज रावण के पुतले फूंकने की जरूरत नहीं है। जितने रावण आसपास बैठे हैं, चाहे वे पाखण्डी धर्माचार्य ही क्यों न हों, हमें उनकी शक्ति को छीनना है।

मात्र चार महीने के भीतर भगवती मानव कल्याण संगठन के जुझारू समर्पित कार्यकर्ताओं के द्वारा अवैध शराब बिक्री के सौ से अधिक प्रकरण पकड़वाकर हजारों लीटर शराब जब्त कराई गई है और इस कारोबार में लगे माफियाओं को जेल भिजवाया गया है। इस कार्य में व्यवधान पड़ते रहेंगे, किन्तु उनके कारण हमें रुकना नहीं है। वर्षा होगी, धूप होगी और संघर्ष आएंगे। हमें भ्रष्ट राजनेताओं को सुधारना है। यदि ये सुधर गये, तो अफसर और कर्मचारी स्वतः सुधरते चले जाएंगे। मेरे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। मैं चाहूँ, तो रोड पर खड़े व्यक्ति को ऊपर पहुंचा सकता हूँ और ऊपर खड़े को घसीटकर नीचे पटक सकता हूँ।

युग परिवर्तन का मेरा कार्य तीन धाराओं के माध्यम से चलेगा। सबसे पहली धारा है पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम। यहां पर आकर मेरे शिष्य माँ की आराधना एवं आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करते हैं। दूसरी है एक स्वयंसेवी भगवती मानव कल्याण संगठन। इसके कार्यकर्ता एक पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त, चरित्रवान, समरसतापूर्ण समाज और विश्व के निर्माण में संलग्र हैं। तीसरी धारा एक राजनैतिक पार्टी होगी, जिसकी घोषणा मैं आज कर रहा हूँ। इसका नाम भारतीय शक्ति चेतना पार्टी होगा। यह देश को एक साफ-स्वच्छ ईमानदार शासन-प्रशासन प्रदान करेगी और वर्तमान बेलगाम राजनीति को लगाम लगाएगी। मुझे स्वयं कोई चुनाव नहीं लडऩा है। मेरा शेष जीवन तो एकान्त साधना एवं महाशक्तियज्ञ की अग्नि के सामने ही व्यतीत होना है। मेरी राजनैतिक पार्टी आज की पार्टियों की तरह देश को लूटेगी नहीं, बल्कि स्वयं को लुटाने के लिए तत्पर रहेगी।

कोई भी कार्य करने से पूर्व मैं शासन-प्रशासन को सूचित अवश्य करता हूँ, किन्तु उन पर निर्भर नहीं करता। मेरे अनुशासित शिष्य सब व्यवस्थाएं संभालने के लिए पूर्ण सक्षम हैं। आवश्यकता पडऩे पर वे शासन-प्रशासन का भी सहयोग कर सकते हैं।

अनीति-अन्याय-अधर्म से समझौता करते हुये हमें बहुत समय हो गया है। अब न तो हम ऐसा सहेंगे और न ही करेंगे। निर्भयता का जीवन जियो। आत्मा अजर-अमर-अविनाशी है। यह शरीर नष्ट हुआ, तो क्या? हम दो गुनी शक्ति लेकर पुनः पैदा होंगे और सत्यधर्म की स्थापना करेंगे। हमारे लिए सबसे पहले धर्म है, उसके बाद है देश और संविधान।

नशा एवं मांसाहार असुरों का आहार है। यह हमारी संस्कृति में नहीं है। यदि आप मांसाहार करते हो, तो उसे छोड़ दो। अब से पहले तुमने क्या पाप किये, उन्हें भूल जाओ। यदि भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प ले लो, तो आपके पापों का फल मैं अपने ऊपर ले लूँगा। तुम सब यहां पर एक कामना की पूर्ति के लिए आए हो, किन्तु तुम्हारी दर्जनों कामनाएं पूर्ण होंगी। भोग को त्यागो और योग को जाग्रत् करो।

समाज मेरी बात को समझ नहीं पाएगा। आप अपनी डायरी में लिखकर रख लें। मुझसे भूत, वर्तमान या भविष्य कुछ भी छिपा नहीं है। 

साधना सामग्री की चोरी करना गोहत्या के समान है। इससे दस गुना पाप लगता है। 

यह शंखनाद धर्मयुद्ध का महाशंखनाद है, आत्मकल्याण का शंखनाद है। अब सभी लोग पांच मिनट तक शंखनाद करेंगे। (शंखनाद हुआ)

माँ से कामना करें कि हम राग-द्वेष से दूर रहें, आत्मकल्याण कर सकें और जनकल्याण कर सकें।

उद्बोधन- द्वितीय दिवस

सत्संगत में सब सार समाहित है। सत्संगत से तात्पर्य है सत्य का संग अर्थात् वाणी, ग्रन्थों, तीर्थों और चेतनास्वरूप गुरु का संग। इसमें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती, बस सुनते रहिये। यदि संस्कार नहीं हैं, तो हम कभी भी सत्संगत प्राप्त कर नहीं सकते। आपका सौभाग्य है कि आप आज उसी सत्संगत में बैठे हैं। चूँकि आपके पूर्व के संस्कार थे, तभी आप यहां के लिए आकर्षित हुये। इस पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम पर समस्त तीर्थों की सत्संगत रहती है।

महाशक्तियज्ञ कोई सामान्य कार्य नहीं है। इसको करने की पात्रता आज विश्व में मेरे अलावा किसी के पास नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अग्निकुण्ड से दो-तीन फुट की दूरी पर बैठकर इस यज्ञ को पूर्ण करके दिखा देगा, तो अपना सिर काटकर मैं उसके चरणों में चढ़ा दूंगा। मेरे द्वारा ऐसे यज्ञों को सहज रूप से कराया गया है।

उन दिनों मैं अपने शरीर को तपाकर अखण्ड साधनाओं में लीन रहता था। वर्तमान में साधना करना कठिन है, किन्तु असम्भव नहीं है। इसी मार्ग पर मैं आप सबको बढ़ा रहा हूँ। जहां तप नहीं, वहां पतन है। जहां पर तप है, वहां पर उत्थान है। आज के प्रायः सभी धर्मगुरु तप न करके भोगलिप्सा में लिप्त हैं। इसीलिए समाज पतन की ओर जा रहा है। तप करोगे, तो उन्नति करोगे।

परमसत्ता के चरणों का मोह मैं कभी त्याग नहीं पाया। इसके अतिरिक्त, मैंने सारे मोह त्याग दिये, यहां तक कि शरीर का मोह भी नहीं किया। परमसत्ता के प्रति समर्पण रखो। उसके प्रति भावपक्ष होना चाहिये।

साधनास्थल पर हिंसा का त्याग करना होता है। पूर्ण अहिंसक बनकर ही आगे बढ़ सकते हो। यदि हम सन्मार्ग पर चलते रहे, तो एक दिन लक्ष्य पर अवश्य ही पहुंच जाएंगे, क्योंकि माँ की कृपा मिलती है। माँ-गुरु और माता-पिता के प्रेम को चन्द शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।

इस संसार में निष्काम कर्म कोई होता नहीं है। हर कर्म के पीछे कोई न कोई कामना रहती ही है। जब भौतिक जगत् की कोई कामना रहती है, तो वह सकाम साधना होती है। किन्तु, आत्मकल्याण या जनकल्याण की कामना से की गई साधना को निष्काम साधना कहा गया है।

मैं आपके उस धरातल को मजबूत करने आया हूँ, जिससे समाज भटक चुका है। मैं साधक प्रवृत्ति जगाने आया हूँ। इससे समाज की हर समस्या स्वतः हल होती चली जाएगी। मेरे लिए धर्मपथ से जुड़ा आपका हित मेरा अपना हित है। मैं आपको दूसरे धर्मगुरुओं की भांति क्षणिक लाभ के लिए नहीं जोड़ता। मैं आपको वह प्रदान कर रहा हूँ, जो जन्म-जन्मान्तर तक आपके पास रहेगा।

यहां पर आश्रम में अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ भी इसलिए प्रारम्भ किया गया है कि एक घोर नास्तिक व्यक्ति भी यदि बैठकर इसे सुनेगा, तो उसमें भी आस्तिकता जाग्रत् हो जाएगी। यह पाठ कोई सामान्य पाठ नहीं है। जहां-जहां तक इसकी ध्वनितरंगें पहुंच रही हैं, वहां का वातावरण पवित्र और कण-कण ऊर्जावान् हो रहा है।

विपत्ति में आप लोग भक्त बन जाते हैं और जब सब कुछ अनुकूल हो जाता है, तो परमसत्ता को भूल जाते हो। मैं इस बात का विरोधी हूँ। माँ की भक्ति में डूबना होगा। समस्या आने पर माँ-गुरु का स्मरण करो, किन्तु चीखने-चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। तुम मुझसे प्रार्थना करो या न करो, जितना आवश्यक है, तुम्हें अवश्य मिलेगा।

मेरे द्वारा शेष 100 महाशक्तियज्ञ पूर्ण किये जाने के उपरान्त संक्षेप में सभी प्रश्रों के उत्तर माँ रूपी ग्रन्थ में अवश्य दिये जायेंगे। माँ ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश की जननी हैं। माँ देवताओं के तेज से प्रकट हुईं- यह एक भ्रान्ति है, ओछी मानसिकता है। वास्तव में, जब देवताओं ने उन्हें पुकारा, तब वह कण-कण से प्रकट हुईं, उसी प्रकार जैसे पत्थर से भगवान् प्रकट होते हैं।

आत्ममन्थन के अलावा कोई मार्ग नहीं है। किन्तु, सन्मार्ग पर चलना पड़ेगा। मनुष्य शरीर में सब कुछ भरा है। कुण्डलिनी जागरण के प्रथम चरण में काम-क्रोधादि बढ़ते हैं। उनके दमन का मार्ग है गुरुभक्ति। तब विषय-विकार स्वतरू नष्ट होते चले जाएंगे। उसके बाद, धर्ममार्ग में बढऩे की ललक पैदा होती है। किन्तु, भटक जाने पर विषय-विकारों की ओर जा सकते हैं। आचार्य रजनीश का यही हाल हुआ। जब गुरु का मार्गदर्शन नहीं मिलता, तब यह हाल होता है।

यह मस्तिष्क सब लोगों की एक प्रयोगशाला है। यह नाडिय़ों के द्वारा सारे शरीर से जुड़ा है। अतः साधक बनकर अपनी नाडिय़ों को जाग्रत् करो और आगे बढ़ो। यही एक मार्ग है। धीरे-धीरे चलो। एक दम बढऩे का प्रयास मत करो। सबसे पहले अपनी शून्य अवस्था को प्राप्त करो। ग्रन्थों के सारे ज्ञान को भुला दो और आत्मा के ग्रन्थ का अध्ययन करो। इससे सभी रहस्य खुलते चले जायेंगे।

श्रद्धा और विश्वास के साथ माँ के रिश्ते की डोर को पकड़कर मजबूत करो। शरीर का शोधन करो। जितना आध्यात्मिक प्रगति करोगे, उतना ही समस्याएं दूर होती चली जाएंगी। सत्य का दामन मत छोड़ो। कर्मवान् बनो। खेद का विषय है कि लोग कर्म नहीं करना चाहते। इसीलिए, धर्मगुरु तुम्हें लूट रहे हैं। बीजमंत्र बेचने वाले चोरों से बचो और तीसरी आंख वाले बाबा के टोटकों से बचो।

आज अधर्मी-अन्यायियों का हर जगह साम्राज्य है। इन धूर्तों का नाम क्या लिया जाय? पिछले दस सालों में भ्रष्ट राजनेताओं ने राजनीति के द्वारा और धर्माचार्यों ने धर्म के नाम पर लूट मचा रखी है। इनके अन्दर कोई नैतिक बल नहीं है। ये धर्माचार्य मेरे चरणों की रज के बराबर भी नहीं है। 

अनीति-अन्याय-अधर्म से समझौता करना बन्द करो। धर्मयुद्ध का महाशंखनाद हो चुका है। लगातार फैलते जाओ। तनिक भी भटकाव न आने पाए। हमारी जीत सुनिश्चित है।

अन्य धर्मगुरुओं की तरह, हमारा लक्ष्य समाज को लूटना नहीं है। हमारा लक्ष्य है, जनकल्याण करना, समाज को निर्मल-पवित्र बनाना। दूसरों का शोषण करने वाला मेरा हितैषी नहीं हो सकता। जातपांत से ऊपर उठकर कार्य करो। दृढ़ संकल्प लो कि कोई भी अधर्मी-अन्यायी हमारी शक्ति का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा।

यह सत्य का शंखनाद है। इसके साथ माँ-गुरुवर की ऊर्जा जुड़ी है। यह तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम इससे जुड़े हो। यह शंखध्वनि समस्त ध्वनियों में सर्वाेपरि है। जिस स्थान पर यह ध्वनि नित्य गुंजरित होती है, वहां पर सात्त्विकता आती चली जाती है। समस्त देवी-देवताओं के हाथ में भी शंख रहता है। इससे कण्ट्रोलर शक्ति जुड़ी रहती है और यह समस्त ध्वनियों को अपने साथ जोड़कर वातावरण को स्वच्छ-निर्मल बनाती है।

हमें इस काल में असुरत्व को नष्ट करना है। आज चारों ओर पतन ही पतन है। राक्षसों के रूप बदल गए हैं। अब उनके लम्बे बाल और लम्बे दांत नहीं हैं। वे देखने में बड़े आकर्षक लगते हैं। ये लोग विषयविकार और शराब में डूबे रहते हैं। इनका रातभर रासरंग चलता है और ब्राह्ममुहूर्त में गधों की तरह पड़कर सोते हैं। ये राक्षसी प्रवृत्ति के लोग समाज को लूट रहे हैं।

इस प्रवृत्ति को यदि रोका न गया, तो आगे चलकर यह और भयावह होगा। आने वाले बच्चों को कीड़े-मकोड़ों का जीवन जीना पड़ेगा। आप लोग ब्राह्ममुहूर्त में उठने की आदत डालो। बच्चों को भी इसका लाभ दिलाओ। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के साथ रियायत हो सकती है, अन्यथा सबको प्रातरूकाल उठाओ और साधना-आराधना करो। धीरे-धीरे अपने आपको बदलो। यह सही है कि सावन-भादों की उफनती नदी में बांध नहीं बनाया जा सकता। किन्तु, धीरे-धीरे प्रयास करो। सफलता अवश्य मिलेगी।

गया जाने से जो लाभ नहीं होगा, वह लाभ चौबीस घण्टे के अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ कराने से घर बैठे ही हो जाएगा। बलिप्रथा एक जघन्य अपराध है। इसे बन्द करो। इसे छोडऩे से आपका कोई अहित नहीं होगा। उल्टे, माता भगवती प्रसन्न होंगी और उनकी कृपा मिलेगी। पहले समाज को दिशा दी जाय। ज्ञान का सम्मान करना सीखो, ताकि कोई अज्ञानी ज्ञानी बनकर समाज को ठग न सके।

आपको गंगा की भी रक्षा करनी है, गोमाता की भी रक्षा करनी है। गोसेवा माता-पिता की सेवा से भी उत्तम है। अतः गाय की सेवा करो। हमारे हृदय में गाय के प्रति प्रेम होना चाहिये, भावपक्ष होना चाहिये।

आश्रम में स्थापित मूलध्वज का सदैव स्मरण रखें। यह कोई सामान्य ध्वज नहीं है। यह माँ का ध्वज है। इसका स्मरण यदि सच्चे मन से करोगे, तो माँ की ऊर्जा प्राप्त होगी। गुरु तो हर पल आपसे जुड़ा ही है। इन क्रियाओं से आपके अन्दर शान्ति और स्थायित्व आता चला जाएगा। जहां पर आप खड़े हैं, उसका आकलन करें और धीरे-धीरे वहीं से आगे बढ़ें।

पहला प्रयास शून्यता को प्राप्त करने का होना चाहिये। मैं कौन हूँ? उस बिन्दु पर खो जाओ। तृप्ति पा जाओगे, आनन्द आएगा और ऊर्जा बढ़ेगी। ध्यान की गहराई मे डूबो। रात्रिशयन से पूर्व भी ध्यान करो। सहज प्राणायाम अवश्य करो। इससे सात्त्विक कोशिकाएं चार्ज हो जाएंगी। प्राणायाम के अभाव में लोगों के फेफड़े सिकुड़ते जा रहे हैं।

मैं हर पल अनुसन्धान कर रहा हूँ। लोग मानसिक रूप से विकलांग होते जा रहे हैं। इससे बचने का एक मात्र साधन आसन-प्राणायाम और ध्यानसाधना ही है। विकारमुक्त एवं चेतनता का जीवन जियो। हमारे जीवन का लक्ष्य अपनी दिव्यता प्राप्त करना है।

मेरे जीवन का सान्निध्य बार-बार प्राप्त नहीं कर पाओगे। तोड़ दो सामाज के उन बन्धनों को, जो तुम्हें सत्यपथ पर बढऩे से रोक रहे हैं, वरना मुझसे मत जुड़ो। परोपकारी बनो और यहां पर जीवनदानी बनकर रहो। मैं सबका आह्वान करता हूँ। साधक की अपनी नींव मजबूत कर लो, तो समझो कि तुमने पहली सीढ़ी तय कर ली है। कर्मवान् बनो और आशीर्वाद का जीवन मत जियो।

सतोगुणी बनो और सत्कर्म करो। यदि यह सब कर लोगे, तो पैंसठ शंकराचार्यों से ऊपर खड़े नजर आओगे। अपने शरीर को आराम मत दो। उसे तपाओ और सेवा एवं साधना को समान भाव से लेकर चलो। जिस प्रकार आकाश में असंख्य तारे हैं, जिनमें कुछ तो प्रकाशमान् हैं और कुछ टिमटिमा रहे हैं, इसी प्रकार तुम्हारे बीच भी कुछ लोग टिमटिमा रहे हैं। एक ऋषि देख रहा है कि कौन टिमटिमा रहा है। उसे मैं ऊर्जा प्रदान करता हूँ।

आज मैं सेवाकारियों को अपना दिव्य आशीर्वाद प्रदान करता हूँ। श्रमशक्ति पुरस्कार पाने का पात्र दूसरा व्यक्ति है रमैया सिंह उर्फ डमरू। इसने सेवा को भी सदैव साधना ही माना है। पिछले दस वर्षों में इसने मुझे एक भी शिकायत का अवसर नहीं दिया। मेरा आशीर्वाद है कि नवीन जीवन में यह किसी सिद्धस्थल के प्रमुख के रूप में स्थापित होगा और एक सर्वसुखसम्पन्न व्यक्ति होगा। यह एक सिद्धसाधक बनेगा और सिद्धाश्रम से जुड़ा रहेगा।

(शक्तिस्वरूपा बहनों द्वारा श्री डमरू जी को ग्यारह हजार रुपये नकद, प्रशस्ति पत्र और एक शॉल पुरस्कारस्वरूप प्रदान किये गये।)

इस अवसर पर मैं अपने सात प्रिय शिष्यों को भगवती मानव कल्याण संगठन का सर्वाेच्च सम्मान प्रमाण-पत्र सिद्धाश्रम रत्न भी प्रदान कर रहा हूँ। ये सात शिष्य हैं, तीनों मेरी बच्चियां पूजा, संध्या, ज्योति योगभारती एवं आशीष शुक्ला, बृजपाल सिंह चौहान, प्रमोद तिवारी और इन्द्रपाल आहूजा। ये सातों मेरी आवश्यकता बन गये हैं। मेरा आशीर्वाद है कि ये चाहेंगे तो सिद्धाश्रम धाम में मेरे साथ सदा-सर्वदा के लिए सूक्ष्म रूप में निवास करेंगे या अगले जन्म में इस सिद्धाश्रम के सिद्धसाधक होंगे। ये चाहेंगे तो भौतिक क्षेत्र की सर्वाेच्च सम्पन्नता भी प्राप्त कर सकते हैं। ये सातों रत्न कभी भी मुझसे दूर नहीं हो सकेंगे।

(इन सातों लोगों को महाराजश्री ने अपने करकमलों से सर्वाेत्कृष्ट शिष्य का प्रमाण पत्र प्रदान किया।) 

सिद्धाश्रम रत्न सम्मान प्राप्त करने वाले सातों जन छायाचित्रण हेतु जब परम पूज्य गुरुवरश्री के दिव्य मंच पर आए, तो ऐसा लगा, मानों आकाश का सम्पूर्ण सप्तर्षि मण्डल परम सिद्धाश्रम धाम सिरमौर ब्रह्मर्षि स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज रूपी धुव्रसत्य के सम्मुख सशरीर उपस्थित हो गया हो। 

इसके उपरान्त, गुरुवरश्री ने घोषणा की कि अगला शक्ति चेतना जनजागरण शिविर 24-25 नवम्बर 2012 को यमुनानगर (हरियाणा) में रखा गया है। तदुपरान्त, 09-10 फरवरी 2013 को जबलपुर (म.प्र.) में शिविर होगा। छत्तीसगढ़ में भी नवम्बर अथवा दिसम्बर 2013 के बीच कभी एक शिविर होगा। 

 

तृतीय दिवस-प्रथम सत्र

शिविर के अन्तिम दिवस प्रातःकाल गुरुदीक्षा का कार्यक्रम था। साढ़े सात बजे से पहले ही पूरा पण्डाल दीक्षार्थियों से खचाखच भर गया था। इसके अतिरिक्त, हजारों दीक्षार्थी पण्डाल के बाहर भी विराजमान थे। कुल मिलाकर लगभग पैंतीस हजार लोगों ने गुरुदीक्षा ग्रहण की।

नियत समय पर परम पूजनीय भगवान् का पण्डाल में पदार्पण हुआ। सबको अपना पूर्ण आशीर्वाद समर्पित करके आपने सबसे पहले एक संक्षिप्त सा चिन्तन दिया-

आप सभी दीक्षार्थी अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं। आप संस्कारवान् हैं, तभी तो ये क्षण आपको प्राप्त हुये हैं। एक चेतनावान् गुरु का शिष्य बनना एक नवीन जन्म होता है। सच्चा जन्म यही है।

हमारे माता-पिता, शिक्षक और धर्मग्रन्थ भी हमारे गुरु होते हैं। किन्तु, एक चेतनावान् गुरु की प्राप्ति बड़े सौभाग्य से होती है। शिष्यों से मेरा रिश्ता आत्मीयता का होता है, जिसमें उनका आध्यात्मिक कल्याण निहित होता है। गुरु अनेक प्रकार के होते हैं, किन्तु हरेक में वह क्षमता नहीं होती कि करोड़ों मील दूर रहकर भी वह शिष्यों का कल्याण कर सके। यह बताना मेरा धर्म है। ऐसा मैं अपनी प्रसिद्धि के लिए नहीं कह रहा हूँ।

मैं आपसे कुछ लेने के लिए नहीं, अपितु आपको कुछ प्रदान करने के लिए आता हूँ। मैं सतत ऊर्जा प्रवाहित करता रहता हूँ। मेरा सम्पूर्ण जीवन शिष्यों को समर्पित है। मस्तिष्क को एकाग्र करके बैठें। अनेक धर्मगुरु दीक्षा देने से पहले अपना पूजन कराते हैं और दीक्षा के पहले मोटा शुल्क लेते हैं। किन्तु, यहां पर दीक्षा नितान्त निरूशुल्क दी जाती है।

मेरी गुरुदीक्षा यही है कि आज के बाद आप पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त एवं चरित्रवानों का जीवन जियेंगे। मासिक धर्म की अवस्था में भी आपको दीक्षा लेने का अधिकार है। मेरे चरणस्पर्श करने से मेरे जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके साथ धर्म जुड़ा है। यह एक प्रकृतिक विधान है। ऐसी स्थिति में देवी-देवताओं की छवि को स्पर्श नहीं करना चाहिये। शुद्धता-सफाई से रहो और दूर से प्रणाम कर सकते हो।

मंत्र जब गुरु के द्वारा उच्चारित होते हैं, तो वे पूर्णरूप से उत्कीलित हो जाते हैं तथा पूर्ण फलदायी होते हैं। देवी-देवताओं में कोई भेदभाव नहीं होता। आप किसी भी देवी या देवता को पहले तिलक कर सकते हैं। गुरुमंत्र पहले कर लेने से गुरु भी आपकी साधना में सहायक हो जाता है।

गुरुवार का व्रत अवश्य रखें। गुरुवार ज्ञान का दिन है, माँ का दिन है। प्रत्येक माह की कृष्णाष्टमी का भी व्रत रखें। उस दिन मेरे द्वारा समाजकल्याण के लिए यज्ञ किया जाता है। यदि किसी कारण यह व्रत छूट जाय, तो नवमी अथवा चतुर्दशी को व्रत कर लें। तब वह खण्डित नहीं माना जाएगा।

आज आप भगवती मानव कल्याण संगठन के नवीन परिवार से जुड़ रहे हैं। नित्य साधना करें और समाजकल्याण में समय लगाओ तथा संगठन की विचारधारा के साथ चलो। आपका जीवन परिवर्तित होता चला जाएगा।

अब तक जो पाप आप कर चुके हैं, उन सबको मैं अपने ऊपर लेता हूँ, बशर्ते कि आप मेरे निर्देश पर चलें।

(तीन बार माँ-ऊँ का क्रमिक उच्चारण कराया गया।)

इससे आनन्द की अनुभूति होती है और अन्तरूकरण चेतन होता है। इसमें पूरी सृष्टि समाहित है। माँ के उच्चारण के समय अन्तर्चेतना को बाहर की ओर आकर्षित करते हैं और ऊँ के साथ बाहर से अन्दर की ओर प्रवेश करके अन्तर्चेतना का ध्यान करते हैं। यह भावपक्ष है।

(अब संकल्प कराया गया)

इस संकल्प में पूरा सार छिपा है। यदि इसका सतत पालन करते रहे, तो आप कभी भी सत्यपथ से भटक नहीं पाएंगे।

अब निम्रवत् तीन-तीन बार मंत्रोच्चारण कराया गया-

1. विघ्नविनाशक भगवान् गणेश- ऊँ गं गणपतये नमः

2. बजरंग बली भगवान् - ऊँ हं हनुमतये नमः

3. भैरव देव जी - ऊँ भ्रं भैरवाय नमः

4. माँ का चेतनामंत्र - ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः

5. गुरुमंत्र - ऊँ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नमः

नित्य साधना करें। मानसिक जाप भी कर सकते हैं। भक्ति और समर्पण के साथ करें। अन्तिम दो मंत्रों पर अधिक एकाग्रता रहनी चाहिये। संकल्पबद्ध जीवन जियें। पूर्व जन्म के फल भी हल्के होकर निकल जाएंगे। सबसे पहले पतन के मार्ग को रोक दो। आपका गुरु हर पल आपकी सहायता अवश्य करेगा।

अपने क्षेत्र में हो रही हर मासिक महाआरती में अवश्य सम्मिलित हों। इससे यहां की मूलध्वज की आरती का लाभ होगा। इसी प्रकार श्री दुर्गा चालीसा पाठ में सम्मिलित होंगे, तो यहां के अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ मंदिर के चालीसा पाठ का लाभ होगा।

समय मिले, तो यहां पर आएं। यह आश्रम आपका है। हर पल मैं आपसे जुड़ रहा हूँ। मैं आपको अपनी चेतना का अंश मानता हूँ। 

यदि विद्यालय में प्रवेश ले लें और पढ़ें नहीं, तो सफलता नहीं मिलेगी। इसी प्रकार, दीक्षा ले लेने मात्र से कुछ नहीं होगा, जब तक कि साधना नहीं करेंगे। आप साधना करेंगे, तो आपका घर उन्नति करेगा। बच्चों को अच्छे संस्कार मिलेंगे। उन्हें बचपन से ही सही दिशा दें।

हिमालय की कन्दराओं में बैठे ऋषि भी अपना शरीर त्यागकर यहां से जुड़ेंगे और मेरी इस यात्रा में सम्मिलित होंगे। यह एक ऐसा अखण्ड प्रवाह है, जिसे कोई रोक नहीं पाएगा। शरीर त्यागने के बाद भी मेरी चेतना इस आश्रम में रहेगी और मार्गदर्शन करती रहेगी। आपसे मेरा रिश्ता केवल इस जन्म का नहीं, अपितु जन्म-जन्मान्तर का है। मैं सदैव आपके साथ हूँ और रहूँगा।

मेरे आशीर्वाद में बड़ी शक्ति है। आपके अन्दर पात्रता होनी चािहये। मैं शब्दों के द्वारा आशीर्वाद दूँ या न दूँ, मेरी चेतना तरंगें आपको स्पर्श करती रहती हैं। ध्यान रखें, आज सायंकाल की दिव्य आरती छूटने न पाय।

अब चरणपादुकाओं के स्पर्श का क्रम हुआ। इस समय दीक्षा ले चुके व्यक्तियों को एक-एक शीशी निरूशुल्क शक्तिजल की दी गई तथा एक प्रपत्र भरकर लौटाने के लिए दिया गया।

तृतीय दिवस- द्वितीय सत्र 

आज सामूहिक विवाह का अतिरिक्त कार्यक्रम होने के कारण, परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् शिविर पण्डाल में प्रतिदिन की अपेक्षा समय से पूर्व ही मंच पर पहुंचे। इससे पूर्व निम्नलिखित समस्त पच्चीस युगल अपना स्थान मंच के सामने ग्रहण कर चुके थे-

1. चि. पप्पू सिंह संग आयु. रेखा मरावी 2. चि. महेन्द्र श्रीवास संग आयु. सन्तोषी श्रीवास, 3. चि. तुलसी साहू संग आयु. अर्चना साहू 4. चि. वागीश गौर संग आयु. माधुरी सिंह 5. चि. हरिश्चन्द्र त्रिपाठी संग आयु. बालकुमारी 6. चि. विनय जोशी, संग आयु. गीता देवी, 7. चि. मान सिंह संग आयु. रचना सिंह 8. चि. उपेन्द्र कुशवाहा संग आयु. आरती देवी 9. चि. अमर सिंह संग आयु. निधि सिंह 10. चि. नरेश जैशवानी संग आयु. अमृता ठाकुर 11. चि. श्रेय श्रीवास्तव संग आयु. महिमा श्रीवास्तव 12. चि. विनोद पनिका संग आयु. राधा पनिका 13. चि. नरेश श्रीवास संग आयु. रचना श्रीवास 14. चि. पुष्पेन्द्र पटेल संग आयु. रोशनी पटेल 15. चि. भोगीराज संग आयु पूजा देवी 16. चि. राजेश पटेल संग आयु. प्रतिभा पटेल 17. चि. अंगिरा प्रसाद संग आयु. शशि पटेल 18. चि. देवेन्द्र पाल संग आयु. माधुरी सिंह 19. चि. ओंकार गोस्वामी संग आयु. पूजा गोस्वामी 20. चि. रजनीश पटेल संग आयु. अर्चना पटेल 21 चि. बुधलाल बैगा संग आयु. विपिन बैगा 22. चि. सत्यम द्विवेदी संग आयु. पूजा राजा दीक्षित 23. चि. परम सिंह संग आयु. सुनीता बाई 24 चि. ईश्वर शरण सिंह संग आयु. निधि सिंह तथा 25. चि. अनिल पटेल संग आयु. कान्ति पटेल।

विवाह अनुष्ठान प्रारम्भ होने से पूर्व परम पूज्य महाराजश्री ने एक संक्षिप्त चिन्तन दिया-

यह योगभारती विवाह पद्धति, जिसके द्वारा आज विवाह संस्कार सम्पन्न होने जा रहे हैं, प्रचलित विवाह-शादियों में आडम्बर और भ्रान्तियां दूर करने के लिए मेरे द्वारा प्रदान की गई है। समस्त हिन्दू रीति-रिवाजों को समाहित करके ये विवाह सहज-सरलतापूर्वक सम्पन्न किये जाएंगे और ये पूरी तरह से फलीभूत होंगे।

आज लड़के का पिता अपने आपको महाराजा और लड़की वाला स्वयं को दास समझता है, जब कि दोनों को समान होना चाहिये, बल्कि लड़की वाले को अधिक मान दिया जाना चाहिये। साथ ही लड़के वालों में लोभ प्रवृत्ति हावी नहीं होनी चािहये। इसके कारण दहेज का दानव खड़ा हो जाता है। विवाह का प्रारम्भ ही लड़ाई-झगड़े से होता है। हर जगह खींचतान, अशान्ति और असन्तुलन रहता है। लाखों-करोड़ों रुपये सजावट पर पानी की तरह बहाए जाते हैं।

बिना शराब और मांस परोसे शादियां नहीं होतीं। गाली-गलौज होती है, इसे शुभ माना जाता है। यदि ऐसा है, तो अपने माँ-बाप और बड़ों का स्वागत भी गाली-गलौज से करो और यदि ऐसा नहीं है, तो इसे बन्द करो। जहां विवाह का प्रारम्भ ही ऐसा होगा, तो सन्तान भी अशान्त एवं असन्तुलित ही उत्पन्न होगी। जीवन की नींव उसी प्रकार पड़ जाती है। डीजे पर ऐसे ऊलजलूल गाने चलते हैं कि कान फट जाते हैं। ऐसे कोलाहल से मन अशान्त होता है। यह राक्षसी प्रवृत्ति है। वास्तव में, ऐसे शुभ अवसर पर सात्त्विक भजन होने चाहियें। तब आगे बच्चे भी शान्त होंगे।

यहां पर योगभारती विवाह पद्धति के अन्तर्गत, न कोई छोटा है न बड़ा। सभी माँ के भक्त बनकर, दास बनकर आते हैं। इस प्रकार वैवाहिक जीवन की शुरूआत धर्म-अध्यात्म से होती है। भविष्य में यही प्रथा समाज में भी प्रचलित होगी। इस विवाह पद्धति में, हिन्दूधर्म के समस्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को समाहित किया गया है। इसमें माँ के शक्तिध्वज को माध्यम बनाया गया है। इस पर वर और कन्या दोनों हल्दी के हत्थे की छाप लगाते हैं। हर जगह शुद्धता, पवित्रता और सात्त्विकता रहती है। यहां पर माँ की अखण्ड ज्योति जल रही है और मैं स्वयं उपस्थित हूँ। यदि वर-कन्या दोनों यहां की विचारधारा के प्रति एकनिष्ठ हैं, तो उनके वैवाहिक सम्बन्ध कभी भी नहीं टूटेंगे। 

यहां पर आज पच्चीस जोड़ों का विवाह संस्कार सम्पन्न होने जा रहा है। काश, मेरा विवाह भी इसी प्रकार होता, तो कितना अच्छा होता! आप सभी उपस्थित लोग शुभकामना करें कि ये जोड़े सतत सत्यपथ पर बढ़ते रहें और इनका वैवाहिक जीवन सफल हो।

1. संकल्पः अब वर-कन्या ने संकल्प की सामग्री देानों हाथों में लेकर और माता आदिशक्ति जगज्जननी का स्मरण करते हुये एकाग्र मन से संकल्प लिया। संकल्प की सामग्री ध्वज में बांधी गई, जिसे घर पर आजीवन सुरक्षित रखा जाएगा।

2. माल्यार्पणः वर-कन्या ने खड़े होकर एक-दूसरे का माल्यार्पण किया और पुनः बैठ गए।

3. गठबन्धनः वर के रक्षाकवच और कन्या की चुन्नी के बीच मजबूत गांठ बांधी गई, जो कभी नहीं खोली जाएगी। इस क्रम को परिजनों ने पूर्ण किया। ऊपर से मौली की गांठ बांधी गई। शक्तिस्वरूपा तीनों बहनों ने भी आशीर्वादस्वरूप मौली बांधी। यह गठबन्धन घर पर सदैव सुरक्षित रखा जाएगा।

4. सिन्दूर समर्पणः वर ने कन्या की मांग में सिन्दूर भरा।

5. मंगलसूत्र समर्पणः वर ने वधू को मंगलसूत्र पहनाया।

6. सात फेरेः वर-कन्याओं ने हाथ में पुष्प लेकर क्रम से सात फेरे लगाए। एक फेरा पूर्ण होने पर पुष्प मंच पर गुरुवरश्री के सम्मुख समर्पित किया और दूसरा पुष्प लेकर अगला फेरा प्रारम्भ किया। फेरा लगाते समय वर-कन्या आगे पीछे नहीं, बल्कि बराबर-बराबर चले। इस बीच माँ-गुरुवर के जयकारे चलते रहे। सातों फेरे क्रमशः पृथ्वी तत्त्व, जलतत्त्व, अग्रितत्त्व, आकाशतत्त्व, वायुतत्त्व, दृश्य एवं अदृश्य जगत् की स्थापित समस्त शक्तियों को साक्षी मानकर लगाए गए।

7. वर-कन्या मूलध्वज की एक-एक परिक्रमा करके आकर यथास्थान बैठ गए।

इस प्रकार, बिना किसी आडम्बर एवं दान-दहेज के यह अनुष्ठान थोड़े से समय में ही सम्पन्न हो गया।

पुनः उद्बोधन 

अब तक भगवती मानव कल्याण संगठन से इतने सारे लोग जुड़ चुकने का अर्थ यह है कि यहां पर सत्य विद्यमान है और माँ की कृपा बरस रही है। हमारा यह विजयरथ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। जब तक सब लोग धर्मवान, कर्मवान् एवं संस्कारवान् नहीं बन जाते, तब तक उसके विकासपथ को कोई रोक नहीं पाएगा। अनीति-अन्याय-अधर्म स्वतः खत्म होता चला जाएगा। यह सत्यधर्म की नींव डाली जा रही है। अन्यायी-अधर्मियों का धरातल उनके नीचे से खिसकता जा रहा है। उनके हृदय में कम्पन्न होगा और समाज का जो शोषण उन्होंने किया है, उसका फल उन्हें भोगना होगा।

हमारी धर्मध्वजा माँ की कृपा से जुड़ी है। इस प्रकार का कार्य आज तक किसी ने भी नहीं किया है। मैंने निर्धन व्यक्तियों को पकड़ा है और उनके अन्दर चेतना भरी है। मेरे एक निर्देशन पर लाखों हाथ उठ खड़े होते हैं। मैं नास्तिक लोगों का आवाहन करता हूँ कि यहां पर आकर खुली आंखों से देखें। लोग कंकड़ों-पत्थरों पर आनन्द की नींद ले रहे हैं। चेहरों पर अलग चेतनता एवं प्रसन्नता है। आखिर कौन सी ऊर्जा काम कर रही है? कंकड़-पत्थरों को लोग माँ की गोद समझ रहे हैं। यह सत्य की ऊर्जा है। जबकि लोगों को गद्दों पर भी नींद नहीं आती।

पारस तो लोहे को सोना बनाता है, लेकिन मेरे शिष्य हरेक को अपने समान बनाने की सामर्थ्य रखते हैं। इनकी निष्ठा और विश्वास अनुकरणीय है। ये जैसा कहते हैं, वैसा करते हैं और वैसा ही जीवन जीते हैं। मैं स्वयं 18-20 घंटे व्यस्त रहता हूँ। यह मेरी दिनचर्या है। अधर्मी-अन्यायी आंखें खोलकर देखें, वह कौन सी ऊर्जा कार्य कर रही है?

कुछ बेईमान राजनेता, उद्योगपति, अधिकारी और मठाधीशों की चौकड़ी समाज को लूट रही है। धूर्त मठाधीश इन अन्यायी-अधर्मियों के चरणों में शीश झुकाते हैं। ऐसे लोगों का सम्मान नहीं, बल्कि अपमान होना चाहिये। अधर्म और अन्याय के इस प्रवाह को रोकना होगा। हमारी आवाज उठती रहेगी। हम जो कहते हैं, वही करते हैं। हम अपना सर्वस्व न्यौछावर कर रहे हैं। ये अधर्मी-अन्यायी जिसका शोषण करते हैं, एक दिन उसी जनता के पैरों तले रौंदे जायेंगे। समय जरूर लगेगा, लेकिन हम अनीति-अन्याय-अधर्म को खत्म करके रहेंगे। न तो हमें अन्याय-अधर्म करना है, न सहना है और न ही होते देखना है। हमें मानवता की रक्षा करनी है।

अधर्म-अन्याय को समाप्त करने के लिये भगवान् राम ने रावण का वध किया और भगवान् कृष्ण ने कंस को मारा। माता भगवती के हाथों में भी शस्त्रों की भरमार है। पापियों को मारना कोई पाप नहीं होता है। हम किसी भी अस्त्र-शस्त्र का उपयोग नहीं कर रहे हैं, किन्त,ु इस विजयादशमी को हमें यह संकल्प लेना है कि अधर्मी-अन्यायियों को जरूर सुधारेंगे। कुछ कभी नहीं सुधरेंगे, उनका धरातल हमें खिसकाना है। ये लोग समाज में जातीयता और साम्प्रदायिकता का विष घोल रहे हैं। हमें उस विष को पीना है।

इस धर्मयुद्ध मेें अपने जीवन को झोंक दो। धर्मपथ पर आगे बढ़ो। शंखनाद भविष्य में भी होते रहेंगे। इसे और गति देते चले जाओ। घर पर नित्य शंखध्वनि करो। इससे समस्त गृहदोष दूर हो जायेंगे और तुम हर काल में अधर्म-अन्याय से मुक्त रहोगे। तुम्हें एक पल के लिये भी प्रेतयोनि में नहीं जाना पड़ेगा।

भोजन का पहला नवाला मुंह में रखने से पहले गरीब-असहाय लोगों के बारे में सोचो, जो एक समय का भोजन भी नहीं जुटा पाते। यह भी एक साधना है। अपनी साधनात्मक ऊर्जा को बढ़ाओ और सत्कर्म करो। यदि कभी कोई दुष्कर्म हो जाये, तो प्रायश्चित करो। अपने बच्चों को संस्कारवान् बनाओ। अधर्मी-अन्यायियों के बच्चे अय्याशी करते हैं।

क्रिकेट का खेल कभी बड़ा पवित्र था। जबसे इसमें अधर्मियों का पैसा लगा, 20-20 शुरू हो गया। इसमें चियर गर्ल्स डान्स करती हैं। लोग क्रिकेट कम और उन्हें अधिक देखते हैं। खेल में भी वासना ही वासना है। आप लोग साधना पथ पर बढ़ें। अधर्मी-अन्यायियों का पतन निश्चित है। यदि ये नहीं मरेंगे, तो भगवती मानव कल्याण संगठन जिन्दाबाद! वह इन्हें जरूर सुधारेगा। हम उन्हें जरूर बदलेंगे। अगर हमने अपने आपको बदला है, तो दूसरों को भी बदलेंगे।

फरवरी 2015 में मेरे शिष्यों की एक ऐतिहासिक चेतावनी रैली दिल्ली जाएगी। इसका नारा होगा- सुधर जाओ, नहीं तो तुम्हें सुधारा जाएगा। वे गद्दार हैं, जो देश को लूट रहे हैं। देश के कानून को बाध्य किया जाएगा कि अधर्मी-अन्यायियों की तिजोरियों के ताले तोड़कर उस धन को जनकल्याण में खर्च करें। यह लक्ष्य पूरा अवश्य होगा। प्रकृतिसत्ता ने हमें सामर्थ्य दी है। उसका उपयोग करना सीखो। दुनिया का सारा वैभव तुम्हारे चारों ओर नाचता नजर आएगा।

यह सामान्य यात्रा नहीं है, एक व्यवस्थित यात्रा है। भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों में लिखी एक-एक बात सार्थक होगी। यह प्रवाह दिन दूना, रात चौगुना बढ़ता जाएगा। हमें समाज को नशा-मांस से मुक्त करना है। अनेक राजनेता मांसाहारी हैं। हमें गोवध रोकना है और सभी जीवों की रक्षा करनी है। मनुष्य को केवल शाकाहारी होना चाहिये। प्रारम्भ में परिस्थितिवश उसे मांसाहार करना पड़ा। यह अलग बात है।

आज हर थाना बिकता है। वहां पर अन्यायी-अधर्मियों का साम्राज्य है। निरपराध लोग जेल में बन्द हैं और अपराधी बाहर घूम रहे हैं। शासन-प्रशासन तुम्हारी मदद नहीं करेगा। तुम्हें स्वयं सक्रिय होकर उन्हें बाध्य करना पड़ेगा। एक एस.पी. ने भगवती मानव कल्याण संगठन के कार्यकर्ताओं को धमकी दी, किन्तु माँ की कृपा से उसका स्थानान्तरण हो गया। उसकी जगह दूसरे अधिकारी आए, जिन्होंने संगठन को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। अनेक अधिकारी ईमानदारी से कार्य करना चाहते हैं, किन्तु बेईमान नेता उन्हें करने नहीं देते।

चेतावनी देने के बाद भी नशे की दुकानें यदि बन्द नहीं होतीं, तो उन दुकानों को हम स्वयं बन्द कराएंगे, भले ही हमें जेल जाना पड़े। अरे बेईमानों, तुम देश को नशेड़ी बनाना चाहते हो? तुम गद्दार हो।

खाली शंखनाद करने से ही कुछ नहीं होगा। जो संकल्प लिया है, उसे क्रियान्वित करो। अपने बच्चों को सही दिशा देने की आवश्यकता है। उन्हें गलत मार्ग में जाने से रोकना होगा। खाली कानून बनाने से कुछ नहीं होगा। दस हजार को फांसी दोगे, तो बीस हजार और खड़े नजर आएंगे। यदि संस्कार नहीं दोगे, तो लाख कानून बना लो, अपराध कभी नहीं रुकेगा।

नारी हमारी जननी है, किन्तु उसे उपभोग की वस्तु समझा जाता है। भोण्डे विज्ञापनों में उनका अंग प्रदर्शन किया जाता है। उसे कोई नहीं रोकता, क्योंकि बेईमान अधर्मी-अन्यायी स्वयं उसमें लिप्त हैं। मीडिया भी नग्नता परोस रहा है। भ्रष्ट राजनेता घोटालों पर घोटाले करके लाखों डकार जाते हैं। देश हर जगह लुट रहा है। इसे रोकने के लिए हमें संघर्ष करना है। इस धर्मयुद्ध में हम अवश्य ही विजयी होंगे, क्योंकि हम सत्यपथ पर हैं।

बेटे-बेटी को एक समान मानो। वंश चलाने हेतु लोग बेटे के लिए पागल हैं, जब कि पीछे की चार पीढ़ी का पता नहीं। आजकल निःसन्तान सबसे सुखी हैं। चाहो, तो किसी निर्धन के बच्चे को गोद ले लो। यहां की कृपा से अब तक हजारों लोगों को सन्तान का लाभ प्राप्त हुआ है, जब कि डॉक्टरों ने उन्हें कह दिया था कि कभी सन्तान नहीं होगी। वास्तव में, भगवती मानव कल्याण संगठन की विचारधारा पर चलने से 90 प्रतिशत लोग निःसन्तान नहीं रह सकते।

बेईमान राजनेता खाद्यपदार्थों में मिलावट नहीं रोक पा रहे हैं। फलस्वरूप, बच्चे दूध के माध्यम से यूरिया पी रहे हैं। इससे समाज नष्ट हो रहा है। मिलावटी खाद्य सामग्री के विरुद्ध भी संगठन को जागरूक रहकर जनान्दोलन करना है।

कुछ योगाचार्य देश का कालाधन विदेश से लाए जाने का आडम्बर कर रहे हें, जब कि वे स्वयं कालेधन के अम्बार पर बैठे हैं। किसी का गुरु खो जाय, तो उसे ढूंढ निकालने में वह रात-दिन एक कर देगा। जब तक गुरु के दर्शन नहीं होंगे, वह चैन से नहीं बैठेगा। एक यह योगाचार्य हैं, जिनके गुरु लापता हुए, तो समाचार पत्र में एक दिन समाचार आया और उसके बाद उसे दबा दिया गया।

नेपाल देश में भगवती मानव कल्याण संगठन के वहां के कार्यकर्ताओं ने जनजागरण का कार्य बहुत अच्छा किया है। इस शिविर में वहां से लगभग ढाई सौ व्यक्ति भाग ले रहे हैं। वहां पर वर्ष 2015 में एक शक्ति चेतना जनजागरण शिविर अवश्य होगा।

अन्त में पांच मिनट तक महाशंखनाद किया गया, जिससे सम्पूर्ण वातावरण गुंजायमान हो उठा।

इस प्रकार, तीन दिन तक चला युग परिवर्तन का महाशंखनाद नामक यह ऐतिहासिक शक्ति चेतना जनजागरण शिविर माँ-गुरुवर की अहैतुकी कृपा से निर्विघ्र सम्पन्न हो गया। इस अपार भीड़ के बावजूद न तो कहीं अव्यवस्था के नाम पर कोई मारामारी हुई और न ही कोई अप्रत्याशित घटना घटी। कुल मिलाकर दिन-रात आनन्द ही आनन्द बरसता रहा!

जय माता की-जय गुरुवर की!