Print

त्रिदिवसीय शक्ति चेतना जन जागरण शिविर (4,5,6 Oct 2011)

Written by Siddhashram Dhaam on .

 

जिस देश के राजनेता और धर्मगुरु भिखारी हों, उसका पतन अवश्यम्भावी है। कुछ को छोड़कर, हमारे अधिकांश नेता भ्रष्ट हैं और देश को लूटकर अपना घर भरने के अतिरिक्त उनका कोई काम नहीं रह गया है। भ्रष्टाचार अमरबेल की भांति ऊपर से नीचे की ओर चलता है। यही कारण है कि आज हर क्षेत्र में और हर स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। समाज में नित नए अपराध, अराजकता एवं निरंकुशता का साम्राज्य निरन्तर बढ़ रहा है। बिना रिश्वत दिये कहीं पर भी कोई कार्य कराना सम्भव नहीं है। आम आदमी का शोषण हो रहा है और उसके दुःख-दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है। जब नेता स्वयं ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे हैं, तो उसे कौन रोकेगा? देश के धर्मगुरुओं का भी यही हाल है, जो कथा-वार्ताएं सुनाकर या योग के नाम पर मात्र आसन-प्राणायाम बताकर भोली-भाली जनता को लूट रहे हैं। उनकी कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत नहीं है और अध्यात्म के नाम पर वे नितान्त ज्ञानशून्य हैं। फिर भी, वे अपने आपको योगगुरु, योगऋषि, योगाचार्य, परमहंस, एवं ब्रह्मर्षि आदि उपाधियों से अलंकृत करके जनता को छल रहे हैं। राजनेताओं को मार्गदर्शन देने के स्थान पर, वे उनके पीछे दुम हिलाते हुये दौड़ते रहते हैं, ताकि उनकी कृपा से उन्हें उनके आश्रम के विस्तार के लिए भूमि और धन मिल जाय। दान के पैसे पर उनका जीवन निर्वाह होता है और वे धनाढ्यों की अपेक्षा कहीं अधिक विलासिता का जीवन जीते हैं। इस कारण, अनीति-अन्याय-अधर्म बढ़ रहा है तथा धर्म की हानि हो रही है।

युग चेतना पुरुष धर्मसम्राट् परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज, जिनका अवतरण ही सत्यधर्म की रक्षार्थ एवं जनकल्याण के लिए हुआ है, ऐसी स्थिति में मूकदर्शक बनकर बैठे नहीं रह सकते। आप,  भ्रष्ट राजनेताओं और ढ़ोंगी-पाखण्डी धर्मगुरुओं को बाहर का रास्ता दिखाएंगे। उनके अनुसार, ये लोग आज जिस समाज का शोषण कर रहे हैं, एक दिन वही समाज निश्चित रूप से इन्हें ठोकर मारेगा।

इस शोषण के प्रति समाज को जाग्रत करने एवं चिन्तनामृत प्रदान करने के लिए परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान श्री शक्तिपुत्र जी महाराज प्रतिवर्ष शक्ति चेतना जनजागरण शिविर का आयोजन करते हैं। इनमें से एक त्रिदिवसीय शिविर पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में और एक द्विदिवसीय शिविर समाज में किसी अन्य स्थान पर आयोजित किया जाता है।

इस वर्ष शक्ति चेतना जनजागरण शिविर पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में शारदीय नवरात्र की अष्टमी, नवमी एवं विजयदशमी की अति महत्वपूर्ण तिथियों में दिनांक 4,5,6 अक्टूबर 2011 के मध्य  आयोजित हुआ। इसमें गुरुवरश्री के देश-विदेश के लाखों शिष्यों, ‘माँ’ के भक्तों तथा श्रद्धालुओं ने परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान द्वारा निर्दिष्ट साधनाक्रमों को अपनाया और उनकी ओजस्वी दिव्य वाणी को हृदयंगम किया। शिविर के अन्तिम दिन प्रातः आठ बजे लगभग 15000 से भी अधिक लोगों ने गुरुदीक्षा प्राप्त की और पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त एवं चरित्रवान जीवन जीने का संकल्प लिया। इसी दिन सायंकालीन सत्र में परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान की पावन सन्निधि में सत्रह नवयुगलों के विवाहसंस्कार योगभारती विवाह पद्धति के अनुसार बिना दहेज तथा बिना किसी आडम्बर के सामूहिक रूप से सम्पन्न हुये।

इस विशाल अलौकिक आयोजन में ‘माँ’ के भक्तों श्रद्धालुओं, जिज्ञासुओं तथा क्षेत्रीय जनता और राष्ट्रीय, प्रान्तीय एवं सम्भागीय स्तर के जनप्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं, न्यायपालिका एवं प्रशासनिक अधिकारियों व प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की विशिष्ट उपस्थिति रही।

विभिन्न व्यवस्थाएं
इस महाशिविर की समस्त व्यवस्थाओं का संचालन केन्द्रीय, प्रान्तीय एवं जिलास्तरीय प्रमुख कार्यकर्ताओं की देखरेख में भगवती मानव कल्याण संगठन के पाँच हजार से भी अधिक सक्रिय सदस्यों ने बड़े ही उत्साह, उमंग एवं तन्मयता के साथ किया। इनमें अनेक गुरुबहनों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा।

इस वृहत आयोजन में सुरक्षा एवं शान्ति बनाए रखने के नाम पर प्रशासन की ओर से पहले दिन मात्र दो कॉन्स्टेबुल भेजे गये थे, जो कुर्सी पर बैठे ऊंघते रहे। संगठन कार्यकर्ता बड़ी मुस्तैदी से इस कार्य को अंजाम दे रहे थे। अतः शेष दो दिन वे दो कॉन्स्टेबुल भी कहीं नजर नहीं आए। समधिन नदी के किनारे से लेकर, समाधि स्थल, स्टॉल्स, मूलध्वज मन्दिर, चालीसा भवन, गुरुआवास के आसपास और भोजन वितरण व्यवस्था, में जहां देखो चप्पे-चप्पे पर सैकड़ों कार्यकर्ता खड़े नजर आते थे। इस प्रकार, यह विशाल आयोजन माँ-गुरुवर की कृपा से शान्तिपूर्वक सम्पन्न हो गया और कहीं पर भी कोई अव्यवस्था अथवा अप्रिय घटना नहीं हुई।

शिविर के तीनों दिन प्रातःकाल मूलध्वज एवं श्री दुर्गा चालीसा अखण्ड पाठ मन्दिर की आरतियों और गुरुवरश्री की चरणपादुकाओं के वन्दन के साथ ही चिन्तन पण्डाल में प्रातः सात से दस बजे तक मंत्र जाप तथा ध्यान-साधना का क्रम होता था। अपराह्न दो से पौने तीन बजे तक विभिन्न क्षेत्रों से आए ‘माँ’ के भक्तों द्वारा अपने-अपने भावगीत प्रस्तुत किये जाते थे। पौने तीन से तीन बजे तक परम पूज्य गुरुवरश्री का पदार्पण होने तक ‘माँ-गुरुवर के जयकारे लगाए जाते थे। इससे सम्पूर्ण वातावरण ‘माँ’मय बन जाता था। महाराजश्री के मंचासीन होने के उपरान्त भी भावगीतों का क्रम जारी रहता था। अन्त में, शक्तिस्वरूपा बहन संध्या एवं ज्योति योगभारती के द्वारा पुनः ‘माँ’-गुरुवर के जयकारे लगवाने के उपरान्त, गुरुवरश्री पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करके अपना उद्बोधन प्रारम्भ करते थे।

प्रथम दिवस

दिनांक 04 अक्टूबर 2011 को चिन्तन पण्डाल अपराह्न दो बजे ही खचाखच भर चुका था। भक्तगण अपने-अपने भावगीत प्रस्तुत कर रहे थे। ‘माँ’-गुरुवर के जयकारों के बीच श्री गुरुदेव का पदार्पण हुआ। उनके मंचासीन होते ही बहन पूजा, संध्या और ज्योति योगभारती ने उपस्थित शिष्यों एवं भक्तों की ओर से उनके चरणकमल पखारे तथा वन्दन किया। तदुपरान्त, पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करके महाराजश्री का दिव्य उद्बोधन प्रारम्भ हुआ:

कलिकाल के भयावह वातावरण मंे चारों ओर अनीति-अन्याय-अधर्म व्याप्त है। तब, सत्य-पथ पर चलना बड़ा ही दुष्कर है। किन्तु, इसके बावजूद आपका संगठन निरन्तर आगे बढ़ रहा है। अपने मन का असन्तुलन दूर करने के लिए आपके अन्दर शिविर में आने की तड़प रहती है। वैसे तो अधिकतर आप लोग कोई न कोई भौतिक समस्या को लेकर ही यहाँ पर आते हैं, किन्तु पिछले वर्ष से मैं देख रहा हूँ कि आप उस पथ पर बढ़ रहे हैं, जिस पर मैं आपको बढ़ाना चाहता हूँ।

माता भगवती हमारी आत्मा की मूल जननी हैं। उनके साथ हमारा रिश्ता कैसा होना चाहिये, इस बात को समाज भूल चुका है। यही उसके पतन का कारण है। यदि उस धरातल को मजबूत कर लें, तो समाज उत्थान की ओर निश्चित जाएगा। यदि ममतामयी माता की एक झलक एक बार हमारी आत्मा से जुड़ गई, तो फिर कभी भी भटकाव नहीं आएगा।

परमसत्ता की ओर बढ़ने का केवल और केवल एक मार्ग है, और वह है भक्तिमार्ग। बिना उसके पूर्णत्व नहीं आ सकता। भक्ति का तात्पर्य है समर्पण, अपने आपको मिटा देना। एक ललक, एक तड़प होनी चाहिये। जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापना करने से ही कल्याण होगा।

आपका गुरु चेतना तरंगो कें माध्यम से कार्य करता है, सूक्ष्म के माध्यम से कार्य करता है। अतः मुझसे मिलने की बजाय, सच्चे शिष्य बन जाओ और कामना पूर्ति के पीछे मत पड़ो। भावपक्ष पैदा करो कि यह जीवन संशय में नहीं गुजारना है। परमसत्ता आपसे दूर नहीं हैं। ‘माँ’ की आराधना सबसे सहज और सरल  है। दुनियाभर के सुख-वैभव को छोड़ो। त्याग की प्रवृत्ति होनी चाहिये। सुख-सुविधायें तुम्हारी सहयोगी नहीं हैं। वे मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं। सत्कर्म करो, तभी सौभाग्य बनेगा।

शक्ति साधक बनो और लोभी प्रवृत्ति से बचो। मांस और नशों का त्याग करो। जो ऐसा कर लेगा, उसके समस्त पापों को मैं ग्रहण कर लूंगा। मेरे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। प्रतिदिन सोलह-सत्रह घण्टे आत्मकल्याण और जनकल्याण में लगाओ। तभी तुम्हारा कल्याण होगा। मन्दिर-मस्जिदों में दौड़ने मात्र से, वहाँ पर माथा रगड़ने मात्र से कुछ नहीं होगा।

आप लोग जानते हुये भी सोए पड़े हो। इसीलिए, मैं बार-बार आवाज देता हूँ कि जागो उठो, और सत्यपथ पर बढ़ो। आलस्य-जड़ता को छोड़ो। आप प्रतिदिन सत्रह-अट्ठारह घण्टे भौतिकता में लगा रहे हैं। किसी भी मार्ग से आए, पैसा आना चाहिये। किन्तु, अनीति-अन्याय-अधर्म से आया हुआ एक रुपया भी फलीभूत नहीं होता। प्रकृति के विधान में रंचमात्र भी ढ़िलाई नहीं है।

समस्याएं पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के फलस्वरूप आती हैं, किन्तु इनके लिए आप परमसत्ता को कोसते हैं। सत्यपथ पर बढ़ो और सत्कर्म करो। इससे तुम्हारा दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाएगा।

तुम लोग कलियुग को सतयुग में बदलने के माध्यम बन रहे हो। सुदामा का जीवन जीना सीखो, जो भूखों रहना पसन्द करता था, किन्तु अन्यायी राजाओं के सामने नहीं झुकता था। अपने गुरु के समान जीवन जियो, जो सत्यपथ पर चलता है, सत्य का जीवन जीता है। दिल्ली का शिविर अनीति-अन्याय-अधर्म के ऊपर एक कील होगी। लोग मेरे सत्य को स्वीकार करने के लिए बाध्य होंगे।

समाज के पतन का मूल कारण काम- क्रोध-लोभ-मोह है। इनमें काम को प्रथम स्थान पर रखा गया है। आज का समाज अधिकांशतः इसी में फंसा है। टी.वी. पर चौबीसों घण्टे कामुक सामग्री ही परोसी जा रही हैं। ‘माँ’ की आराधना विषय-विकारों में रहकर नहीं की जा सकती। जब भी मन में विकार आएं, तो उसे तुरन्त दूसरी ओर मोड़ दो। तब दुनियाभर की औरतें, माँ-बेटी नजर आएंगी। आज अष्टमी का दिन है। इसलिए, संकल्प लो कि विवाह से पूर्व कभी शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनायेंगे और विवाह के उपरान्त एक पति/पत्नी व्रत का दृढ़ता से पालन करंेगे। चरित्रवानों का जीवन जीकर देखो। आनन्द और तृप्ति मिलेगी।

जिस प्रकार आपका स्थूल नेत्र होता है, उसी प्रकार ज्ञान का सूक्ष्म नेत्र भी होता है। जब वह जाग्रत होता है, तब भूत-वर्तमान-भविष्य कुछ भी छुपा नहीं रह सकता। मैं इस युग में त्रिकालज्ञ होने का प्रमाण देने के लिए उपस्थित हुआ हूँ। विज्ञान इस शरीर का जैसे भी शोध करना चाहे, यह उसके लिए सदैव तैयार रहेगा।

आडम्बर और प्रदर्शन हमारे धर्म को नष्ट कर रहे हैं। एक नेता बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होता है, तो उसके चमचे टी.वी. में आने के लिए आडम्बरपूर्ण तरीक से अनुष्ठान करते हैं। गीता-रामायण-कुरआन का पाठ शुरु कर देते हैं, तो कोई यज्ञ और हवन करने लगता है। इस सबसे वह नेता या उसके परिजन भले ही खुश हो जाते हों, किन्तु परमसत्ता का विधान अटल है। इस प्रकार के कार्यों से वह नेता स्वस्थ हो जाएगा या उसे जीवनदान मिल जाएगा, यह सम्भव नहीं है।

समाज में आज पाखण्डियों की भरमार है। अनेक तान्त्रिक-मान्त्रिक समाज को लूट रहे हैं। इसीलिए, यह समाज हित में होगा कि इस तथ्य का परीक्षण हो कि कौन योगी है और कौन भोगी है? दिल्ली में शंखध्वनि गूंजेगी कि इस प्रकार के लोग वहाँ पर आकर अपनी क्षमता प्रमाणित करें। परमसत्ता ने हम सबको स्वतन्त्र कर रखा है, किन्तु हम लोगों ने ही स्वयं को बांध रखा है। इन बन्धनों को तोड़ना होगा और यह होगा तप करने से।

अनीति-अन्याय-अधर्म से कमाया हुआ धन विष के समान होता है। यदि तुम इस प्रकार का धन लाते हो, तो तुम अपने परिवार के शत्रु बन जाओगे। यहां से संकल्प लेकर जाना कि अपने बच्चे को भ्रष्टाचारी नहीं बनाओगे। आज दो-चार प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जो फर्जी सर्टिफिकेट बनवाकर सरकारी नौकरी कर रहे हैं। उनका पतन निश्चित है।

ऐसे ही अति महत्वपूर्ण चिन्तनों के उपरान्त अन्त में, बहन पूजा, संध्या एवं ज्योति योगभारती के द्वारा सुसज्जित आरती थालियां लेकर दिव्य आरती का क्रम पूर्ण किया गया। तदुपरान्त, परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान की चरण पादुकाओं के प्रणाम का कार्यक्रम बड़े ही व्यवस्थित ढं़ग से सम्पन्न हुआ। महाराजश्री मंच पर तब तक विराजमान रहे, जब तक एक-एक व्यक्ति ने प्रणाम नहीं कर लिया। अब प्रसाद प्राप्त करके, सभी ने रात्रिभोजन के बाद विश्राम किया।

द्वितीय दिवस
दूसरे दिन  05 अक्टूबर 2011 को भी पहले दिन की ही तरह भावगीतों और जयकारों का क्रम जारी रहा। परम पूज्य गुरुवरश्री पधारकर मंचासीन हुये तथा चरणवन्दन के उपरान्त, पूर्ण आशीर्वाद समर्पित करके उन्होंने अपने दिव्य उद्बोधन में कहाः

सत्कर्मों के फलस्वरूप ही ऐसे क्षण आते हैं, जब अपने इष्ट की कृपा प्राप्त करने के लिए, एक साथ इतना बड़ा जनसमूह पवित्र धाम में बैठकर, आराधना का सौभाग्य पाता है। बिना परमसत्ता की कृपा के यह दुर्लभ होता है। अतः इन क्षणों का पूरी तरह से सदुपयोग करें। यही वह धाम है, जहाँ पर परमसत्ता अपने मूल स्वरूप में स्थापित होंगी।

युग परिवर्तन के कार्य में भगवती मानव कल्याण संगठन एक लक्ष्य को लेकर लगा है और इस चक्र को आगे बढ़ा रहा है। यही संगठन युग परिवर्तन का शंखनाद करेगा। यह सौभाग्य इस संगठन के साधकों को प्राप्त होने वाला है।

जब आप यहाँ पर पहले आते थे, तो मुझे अशान्ति होती थी। किन्तु, अब सन्तोष होता है। इसका अर्थ यह है कि आप लोगों में सार्थक परिवर्तन आ रहा है। पूर्ण परोपकारी और सदाचारी जीवन जीने वाला व्यक्ति कभी भी पतन के मार्ग पर नहीं जाता। परमसत्ता को भी ऐसे लोग पसन्द हैं।

आप धीरे भले ही चलें, किन्तु आपकी दिशा और दशा भटकनी नहीं चाहिये। लक्ष्य अवश्य मिल जाएगा। हमारे ऋषियों ने भी, यही रास्ता तय किया है। अपने जीवन में परिवर्तन का संकल्प ले लो। मैं तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर का साथी हूँ। भौतिक जगत का जीवन उतना जियो, जितना नितान्त आवश्यक हो। सुसंस्कारों का अधिक से अधिक संचय करो।   धन-सम्पति एकत्र करने के पीछे मत दौड़ो। अपने से नीचे खड़े समाज का सहारा बनो। यह भावना हर पल रहनी चाहिये।

शरीर तो सुख चाहता है, किन्तु उसे सुख देने से आपको कुछ नहीं मिलेगा। उल्टे पतन के मार्ग पर जाओगे। भोजन उतना करो, जितना नितान्त आवश्यक है। जितना खाओ, उतना काम अवश्य करो। जीवन को दो भागों में बांटो- शरीर और आत्मा। शरीर पर कम और आत्मा पर अधिक ध्यान दो। अवश्य ही शरीर को भी स्वच्छ एवं पवित्र रखो। हर पल मन में ‘माँ’ की आराधना रहे।

परिवर्तन का चक्र सहज नहीं है। बहुत कठिन है, किन्तु असम्भव नहीं है। सूर्योदय के समय सूर्य बहुत मध्यम होता है। जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, उसकी प्रखरता बढ़ती जाती है। भगवती मानव कल्याण संगठन सूर्य के समान आगे बढ़ रहा है। बादलों का अस्तित्व क्षणिक होता है। वे स्वतः छंटते चले जाते हैं। इसी प्रकार विघ्न-बाधाओं के बावजूद संगठन आगे बढ़ रहा है।

समाज में आज कामचोरी और अकर्मण्यता बढ़ रही है। स्त्री जब गर्भवती होती है, तो उससे कहा जाता है कि आराम करो, बोझ मत उठाओ, आदि-आदि। माता यदि परिश्रम नहीं करेगी, तो स्वाभाविक ही बच्चा अकर्मण्य होगा। माताओं को भी परिश्रमी होना चाहिये। डाइटिंग मत करो। यह अप्राकृतिक है। शरीर की स्वस्थ रखो। तभी तो चेतनावान अंशों को जन्म दोगे। यदि ऐसा नहीं करोगे तो पतन के मार्ग पर जाओगे। कर्मवान्-     धर्मवान्-चरित्रवान् बनो। निर्विकार जीवन जियो। विषय-विकारों से चेतना शक्ति नष्ट होती है तथा ओज-तेज घटता है।

गुरु किसी से कोई भेदभाव नहीं करता। न्यूनता करने पर दण्डित अवश्य करता है। मैं तो हर एक को जोड़ने आया हूँ, आगे बढ़ाने आया हूँ। मैं अपनी चेतना को तुम्हारी चेतना में समाहित करना चाहता हूँ। हर पल माँ की स्मृति बनी रहनी चाहिये। माँ का गुणगान कोई सामान्य अनुष्ठान नहीं है। इसी के बल पर यह अंधियारी वन, जो किसी समय निर्जन था, एक दिव्य धाम बन गया है। अब घर-घर में माँ की आराधना हो रही है और सहज भाव से परिवर्तन आ रहा है।

चालीसा भवन के निर्माण में, मेरा लक्ष्य है कि कम से कम पचास प्रतिशत योगदान मेरे शिष्यों का होना चाहिये। किन्तु, अभी तक मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत ही उनका योगदान हो पाया है। इसलिए, आज मैं आपको  कर्तव्यबोध करा रहा हूँ कि यदि आपके अन्दर पात्रता है, तो आज से तीन महीने के भीतर सहयोग करें। लेकिन, कर्ज लेकर कभी भी ऐसा न करें।

कर्म का फल सुनिश्चित है। इससे   अधिक पावन कर्म क्या होगा कि आप समाज   सुधार की ओर बढ़ रहे हैं। समाज सुधार के लिए बहुत बड़े आन्दोलन की आवश्यकता नहीं है। ऐसे आन्दोलनों से समाज में अशान्ति फैलती है और उग्रवाद पनपता है। इससे समाज पतन की ओर जाता है। शक्ति का दुरुपयोग मत करो। कायरों का जीवन मत जियो। सड़क जाम मत करो। समाज को कष्ट मत दो, उसके सहारा बनो। तोड़-फोड़ का रास्ता मत अपनाओ। इससे तुम अपराधी बनोगे। हमारी शान्ति को कोई कमजोरी न समझे, इसलिए जहाँ अति आवश्यक हो, वहीं पर शक्ति का उपयोग करो।

इस देश मंे इस समय भ्रष्ट-बेईमानों का समूह जुटाने वाले बहुत सारे संगठन होंगे, किन्तु भगवती मानव कल्याण संगठन ईमानदारों का संगठन है। पांच साल बाद आप देखेंगे कि यह विश्व का सर्वश्रेष्ठ संगठन होगा।

मैं तीन धाराओं के माध्यम से कार्य कर रहा हूँ। ये हैं, साधना-आराधना, समाजसेवा और राजनीति। पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम की स्थापना साधना-आराधना के केन्द्र के रूप में की गई है। भगवती मानव कल्याण संगठन का गठन समाजसेवा के लिए किया गया है तथा शीघ्र ही एक राजनैतिक दल का गठन किया जाएगा। इस प्रकार, ये तीनों व्यवस्थायें, मेरी तीनों पुत्रियों पूजा, संध्या व ज्योति द्वारा संभाली जायेंगी।

आज के राजनेता सभी बेईमान नहीं हैं, किन्तु शीर्ष पर बैठे लोगों में नब्बे प्रतिशत भ्रष्ट हैं। ट्रेन के जिस डिब्बे में आप सफर करते हैं, वे उसे ‘ऐनिमल क्लास’ कहते हैं और आपको पशु समझते हैं। भविष्य में कोई शक्तिसाधक या शक्तिसाधिका ही लालकिले पर तिरंगा फहराएगा।

भ्रष्ट राजनेताओं के लिए भी धर्मगुरु ही जिम्मेदार हैं, क्यांेकि उन्होंने उनका सही मार्गदर्शन नहीं किया। हर राजनेता किसी न किसी धर्म संस्था से जुड़ा है। आज धर्मगुरु दबी जबान से उनकी बुराई करते हैं, वैसे उनके सामने सिर झुकाते हैं।

बम विस्फोट करने से, आतंक फैलाने से भी परिवर्तन नहीं आएगा। आपका पड़ोसी पाकिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण है। उसने उग्रवादी दूसरों के लिए पैदा किये, किन्तु आज सबसे ज्यादा बम विस्फोट वहीं पर हो रहे हैं। ध्यान रहे, हमें कभी भी उग्रवादी नहीं बनना है।

साधु-सन्तों का जीवन जीने वालों का मैं सम्मान करता हूँ। किन्तु, उन तथाकथित साधु-सन्तों को, जो छल-प्रपंच के द्वारा समाज का शोषण कर रहे हैं, मेरी चुनौती है कि यदि उन्होंने अपनी माँ के स्तन का दूधपान किया है, तो मेरे साधनात्मक तपबल का सामना करंे। इसी प्रकार, विज्ञान को भी मेरी चुनौती है कि वह मेरे शरीर का जैसे भी चाहे, शोध करे। इसके लिए यह शरीर सदैव तत्पर है।

आन्दोलन छेड़ना एक योगी का धर्म नहीं है। होहल्ला मचाने और धरातलीय कार्य करने में बड़ा अन्तर होता है। योगी के अन्दर अलौकिक क्षमता होती है। अन्नमय कोष छोड़कर उसका प्राणमय कोष जाग्रत हो जाता है और तब वह चाहे तो, बिना कुछ खाए-पिए हजारों साल तक जीवित रह सकता है। मात्र छः-सात दिन की भूख हड़ताल के बाद, यदि उसे अस्पताल जाना पड़े, तो वह कैसा योगी और कैसा योगऋषि? उसे दृढ़तापूर्वक एवं गर्व के साथ गिरफ्तारी देनी चाहिये। क्या जरूरत है लड़कियों का सलवार-कुर्ता पहनकर कायरों की तरह भागने की? इस प्रकार के लोग, जो भगुए वस्त्र पहनकर समाज को ठग रहे हैं, उनके लिए ‘धूर्त’ शब्द भी न्यून रह जाता है। बीज मन्त्र बेचने वाले और दरबार लगाकर टोटके बताने वाले भी ऐसे ही हैं। हम प्रशासन को भी सन्देश देना चाहते हैं कि हमें उनके सहयोग की आवश्यकता नहीं है। यदि उन्हें जरूरत पड़े, तो हमें बताएं। हम सदैव सहयोग देने के लिए तैयार हैं।

अन्त में, त्रिशक्तिस्वरूपा बहनों के द्वारा दिव्य आरती क्रम पूर्ण किया गया। तदुपरान्त, परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान की चरणपादुकाओं को प्रणाम करके सभी ने प्रसाद ग्रहण किया और भोजनोपरान्त रात्रिविश्राम किया।

तृतीय दिवस-प्रथम सत्र
दिनांक 06 अक्टूबर 2011 को विजयादशमी पर्व और इस शिविर का अन्तिम दिन था। उस दिन प्रातः 8 बजे से गुरुदीक्षा का कार्यक्रम था। कुल मिलाकर लगभग पन्द्रह हजार पुरुषों, महिलाओं एवं बच्चों ने दीक्षा प्राप्त की।

प्रातः आठ बजे के ‘माँ’-गुरुवर के जयकारों के मध्य परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान का पण्डाल में शुभागमन हुआ। मंचासीन होने के बाद, उन्होंने सबको अपना आशीर्वाद समर्पित किया तथा दीक्षा प्रदान करने से पूर्व संक्षिप्त चिन्तन दियाः

गुरु-शिष्य का रिश्ता अटूट होता है और संसार के समस्त रिश्तों में सर्वोपरि है। यह रिश्ता दृश्य जगत और अदृश्य जगत दोनों से जुड़ा है। यह भक्तिभावना पर आधारित होता है। दीक्षा देते समय गुरु-शिष्यों से अपना पूजन नहीं कराता, अपितु उन्हें अपने चिन्तन में लेता है। शिष्य जिस रूप में भी आएं, उन्हें उसी रूप में स्वीकार करता है। माता-पिता, शिक्षक और साधु श्रेणी के महात्मा भी गुरु होते हैं। किन्तु, एक चेतनावान गुरु शक्तिपात के माध्यम से दीक्षा देता है और शिष्यों को अपने नेत्रों में स्थापित करता है।

विद्यालय में प्रवेश लेने के बाद, जो बच्चा परिश्रम करके पढ़ाई करता है, वह आगे बढ़ता है और सफलता प्राप्त करता है। उसी प्रकार, दीक्षा लेने के उपरान्त जो निष्ठापूर्वक साधना करेगा, तो निश्चय ही आगे बढ़ेगा। खाली दीक्षा लेने मात्र से ही कुछ नहीं होने वाला है। साथ ही नशा-मांसाहार छोड़कर चरित्रवान् बनना होगा तथा मानवीय मूल्यों की स्थापना करना पड़ेगा। जो शिष्य अवगुणों से दूर रहकर भगवती मानव कल्याण संगठन के आदेशों-निर्देशों को सर्वोपरि मानेंगे, उन्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता।

आपके संस्कार जैसे भी हैं, वहीं से आगे बढ़ना है। ‘मैं कौन हूँ’-यह जानने के लिए सतत् प्रयास करना है। अपने घर को ‘माँ’ का मन्दिर बनाएं और नियमित रूप से नित्य साधना क्रम अपनाएं। हर पल चिन्तन रखें कि आप किस गुरु से, किस धाम से जुड़े हैं। आप एक साधक हैं- हर क्षण यह ध्यान रहना चाहिये। मैं किसी को भी वैरागी नहीं बनाता। घर में रहकर ही सब कुछ हो सकता है। भगवती मानव कल्याण संगठन की विचारधारा से जुड़ोगे, तो फिर कभी भी जीवन में नहीं भटकोगे। तत्पश्चात एक संकल्प बुलाने के बाद मंत्र प्रदान किये गये व गुरुवरश्री ने आगे चिन्तन प्रदान करते हुये कहा-

दीक्षा ग्रहण करने के बाद स्वतः ही आप भगवती मानव कल्याण संगठन के सदस्य बन जाते हैं। उसके बाद जनजागरण करंे। अब आप अकेले नहीं हैं। संगठन के लाखों सदस्यों से जुड़ चुके हैं। चेतनावान् गुरु के आभामण्डल की कोई सीमा नहीं होती। मेरे नेत्रों से, रोम-रोम से चेतना तरंगें निकलती रहती हैं। इस तरह की चेतना तरंगें न तो आज तक किसी ने प्रवाहित की हैं और न कोई कर सकेगा।

‘माँ’ से सदैव भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति की कामना करो। व्यापारी मत बनो। वो स्वयं जानती हैं, हमें क्या चाहिये और क्या मिलने से हमारा कल्याण होगा। ‘माँ’ की ममता का सागर अनन्त है। मैं उसमें लगातार तैर रहा हूँ, फिर भी मुझे उसकी सीमा नहीं मिली। बस, आनन्द लेते रहो।

मानसिक जाप में शौच-अशौच का कोई अन्तर नहीं पड़ता। महिलायें अपवित्रता के दिनों में थोड़ा सीमाओं का पालन करें। छवियांे को स्पर्श न करें, बच्चों के द्वारा स्नान करा दें और दूर बैठकर नमन कर लें। आज मूलध्वज की कम से कम एक परिक्रमा कर लें और एक चालीसा पाठ अवश्य करें।

इस प्रकार, गुरुदीक्षा का क्रम सम्पन्न हुआ। गुरुवरश्री की चरण पादुकाओं को प्रणाम करके आते समय सभी दीक्षार्थियों को निःशुल्क शक्तिजल, दिल्ली शिविर से सम्बन्धित पैम्लेट्स तथा एक दीक्षा पत्रक भरकर लौटाने हेतु दिया गया।

तृतीय दिवस-द्वितीय सत्र
दो बजे से भावगीतों का क्रम प्रारम्भ हुआ। इस सत्र में सबसे पहले सत्रह नवयुगलों के विवाह संस्कार योगभारती पद्धति से सम्पन्न होने थे। निर्धारित समय पर माँ-गुरुवर के जयकारों के बीच परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान का पण्डाल में पदार्पण हुआ। मंचासीन होते ही आपश्री के चरण कमलों का प्रक्षालन एवं वन्दन हुआ और अपना पूर्ण आशीर्वाद समर्पित करके चिन्तन दियाः

समाज में व्याप्त कुरीतियों और आडम्बरों को दूर करने के लिए यह योगभारती विवाह पद्धति प्रदान की गई है। इसमें प्रचलित हिन्दू विवाह पद्धति का समावेश किया गया है। इसके अन्तर्गत सबसे महत्वपूर्ण संकल्प होता है, क्योंकि जिस व्यक्ति को आपने पति या पत्नी मान लिया, वही वास्तविक जीवनसाथी होता है। विवाह तो मात्र शिष्टाचार की पूर्ति है।

ये नए जोड़े वास्तव में अति सौभाग्यशाली हैं, जिनके विवाह संस्कार ऐसे पवित्र धाम पर सम्पन्न हो रहे हैं, जहाँ पर मैं स्वयं साकार रूप से उपस्थित हूँ। यहाँ पर वरपक्ष और कन्यापक्ष दोनों बराबर हैं। इनमें किसी को भी विशेष सम्मान की अनुमति नहीं दी जाती।

आम शादियों में सबसे पहले पान भेंट किया जाता है, बीड़ी-सिगरेट आदि भेंट की जाती है। तो, शादी कहाँ तक सफल होगी? मांस-मदिरा परोसे जाते हैं। यह सब भटकाव है। फिर गालियों से स्वागत होता है। इससे सम्मान-आत्मीयता नहीं होती। अतः यह पद्धति समाज को सही दिशा प्रदान कर रही है।

तत्पश्चात पूर्ण विधि-विधान के विवाह क्रम सम्पन्न किया गया। ये नवयुगल हैं- 1. अमित शुक्ला संग अर्पिता दुबे तथा 2. प्रवीण अवस्थी संग प्रियंका बाजपेयी 3. ललित चौबे संग कविता राव 4. प्रेमा रजक संग प्रीति रजक 5. विनोद पाठक संग प्रियंका मिश्रा 6. देवदत्त विश्वकर्मा संग कल्पना विश्वकर्मा 7. सन्तोष पटेल संग शकुन पटेल 8. नरेश चन्द्रा संग सरोज महरा 9. देवी कुशवाहा संग शशि कुशवाहा 10. नारायण संग कौशल्या 11. विनोद संग मोनी 12. ज्ञानेश तिवारी संग मोहिनी मिश्रा 13.प्रदीप सेंगर संग कृष्णा गौर 14. जितेन्द्र भदौरिया संग रीना सिंह 15. अमित शर्मा संग लक्ष्मी चौरसिया 16. रवि गुप्ता संग रानी गुप्ता 17. आलोक नामदेव संग प्रतिभा नामदेव।

तदुपरान्त, श्री गुरुदेव भगवान ने अपने दिव्य उद्बोधन में कहाः वीर वह होता है, जो दूसरों पर विजय प्राप्त करता है। किन्तु, महावीर वह होता है, जो स्वयं पर विजय पा ले। भगवान् महावीर ने स्वयं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी पर्व तभी सार्थक होगा, जब आप अपने काम-क्रोध-लोभ-मोहादि पर विजय प्राप्त करेंगे।

आजकल विजयादशमी के दिन, लोग रावण को जलाते हैं, किन्तु वहीं पर रावण प्रवृत्ति के सैकड़ों लोग होते हैं जो महिलाओं से छेड़छाड़ करते हैं। आज ऐसे रावणों को परास्त करने की जरूरत है। प्रकृति पूर्ण त्रिगुणात्मक है। सत-रज-तम को कोई नष्ट नहीं कर सकता। हाँ, इन पर अंकुश लगाया जा सकता है। इन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं और इसे ही कहते हैं, आत्मविजय। अन्दर को सन्तुलित कर लो, तो बाह्य स्वतः सन्तुलित हो जाएगा।

अनीति-अन्याय-अधर्म के खिलाफ आवाज उठाओ। इन्हें देखते हुये चुप मत रहो, नहीं तो तुम भी उस पाप के भागीदार बनोगे। आज समाज में कहीं पर यदि एक अपराधिक प्रवृत्ति का व्यक्ति बैठा हो, तो दस ईमानदार सिर झुकाकार निकलते हैं। किन्तु, मैं चाहता हूँ कि ऐसा वातावरण बने, जहाँ एक ईमानदार बैठा हो, तो दस अपराधिक प्रवृत्ति के लोग सिर झुकाकर निकलें। दीपावली पर्व पर जुआ-सट्टा मत खेलो। सात्विकता के साथ पूजन करो। उस दिन भी श्री दुर्गा चालीसा का पाठ करो। उसमें महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती की आराधना सम्मिलित है।

अपनी शक्तियों का सदैव सदुपयोग करो। दुरुपयोग करोगे, तो प्रकृतिसत्ता तुम्हें, कभी शक्ति नहीं देंगी। आज समाज में अन्यायी-अधर्मियों का साम्राज्य हो रहा है। चिटफण्ड कम्पनियों के चक्कर में मत पड़ो। मोबाइल में लॉटरियों के फ्रॅाड चल रहे हैं। संगठन का सदस्य बनकर भी कोई फ्रॅाड करने आपके घर आ सकता है। इनके विरुद्ध सतर्क रहो तथा ऐसे लोगों के पकड़े जाने पर इसकी सूचना तुरन्त संगठन के केन्द्रीय कार्यालय को दो। यह सब रोजगार न मिलने के कारण हो रहा है। वास्तव में, यह हमारी बेईमान सरकार की गलत नीतियों का परिणाम है। अपने अधिकारों की लड़ाई में पीछे न रहो और अपनी विचारधारा से समझौता न करो।

विवाह में कभी भी दहेज स्वीकार मत करो। अपने कर्म से उपार्जित धन पर विश्वास करो। परमसत्ता पर विश्वास रखो। जिस परिवार से सम्बन्ध जुड़ रहा है, दहेज की मांग करके उसे दयनीय स्थिति में मत करो।

बलिप्रथा से दूर रहो। अपने अवगुणों को भंेट करो। बलि का अर्थ है, अपने अवगुणों की बलि। भैरव और काली पर लोग मांस-मदिरा चढ़ाते हैं, शिव पर भांग-धतूरा चढ़ाया जाता है, जिन्होंने समाज रक्षा के लिए विषपान किया, उन महादेव को विषपान करा रहे हैं। अरे, भगवान शिव तो सात्विकता के प्रतीक हैं।

शून्य से शिखर की यात्रा तय करने वाले, भिखारी से करोड़पति-अरबपति बने योगी, अभी भी स्वयं को इण्टरनेशनल भिखारी ही कहते हैं। स्वयं भ्रष्ट हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन पर बैठते हैं तथा गिरफ्तारी से बचने के लिए लड़कियों का सलवार-कुर्ता पहनकर भागते हैं। ऐसे कायर-कमजोर-बुझदिल योगी हैं आज के! पहले तो ‘भारतरत्न’ का सम्मान पाने के लिए भागदौड़ करते रहे और जब सफलता नहीं मिली, तो स्वयं को ‘राष्ट्रनायक’ कहने लगे। उन्होंने अनीति-अन्याय-अधर्म का रास्ता तय करके स्वयं को समाज में स्थापित किया है। ऐसे लोग गद्दारी और छल कर रहे हैं। कोई गुरु संघर्ष आने पर शिष्यांे के सामने रोने लगे। अरे, चेतनावान गुरु में तो ऐसी स्थिति में और अधिक चेतनता आनी चाहिये।

काल का चक्र परिवर्तन के मोड़ पर है। कायरों का जीवन जीने से प्रकृति का आशीर्वाद नहीं मिलता। अधर्मी, नशेड़ी, मांसाहारी व्यक्ति को कभी भी वोट मत देना। आज नब्बे प्रतिशत सांसद अपराधी हैं, जिन्होंने संसद पर कब्जा कर रखा है। उसे मुक्त कराना है।

आप लोग जिस दिन अपने हृदय में ‘माँ’ की स्थापना कर लेंगे, मानव बन जायेंगे। मेरी यात्रा को कोई भी रोक नहीं पाएगा। यदि आप मेरे साथ नहीं चलोगे, तो कोई और माध्यम बनेगा। तदुपरान्त, नित्य की भांति आरती क्रम पूर्ण किया गया। सभी ने पंक्तिबद्ध होकर गुरुवरश्री की चरणपादुकाओं को प्रणाम करके प्रसाद ग्रहण किया।

इस प्रकार, तीन दिन तक चला यह विशाल दिव्य आयोजन शान्तिपूर्वक हर्षोल्लास के साथ  सम्पन्न हो गया। परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान के द्वारा छेड़ा गया यह विलक्षण जनजागरण अभियान अब तीव्र गति से बढ़ रहा है। इसमें दिल्ली शिविर एक मील का पत्थर सिद्ध होगा, जहाँ पर लाखों लोग युग परिवर्तन के लिए एक साथ शंखनाद करेंगे।

हरीलाल का भाग्य चमका
परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् धर्मसम्राट युग चेतना पुरुष पुरुष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की अहैतुकी असीम कृपा कब, कहाँ और किस पर बरस पड़े, यह कहना बड़ा कठिन है। इस शिविर के दूसरे दिन, जब महाराजश्री मानव जीवन में ‘परिश्रम’ के महत्व को रेखांकित कर रहे थे, तो आपश्री ने भगवती मानव कल्याण संगठन के द्वारा इस वर्ष से प्रारम्भ किये गये ‘श्रमशक्ति पुरस्कार’ की घोषणा की और बताया कि यह पुरस्कार प्रथम बार जिस व्यक्ति को प्रदान किया जाने वाला है, उसका नाम है ‘हरीलाल’। वह इस आश्रम में मजदूरी करता है और पिछले दस-बारह वर्षों के दौरान उसका कार्य सर्वश्रेष्ठ पाया गया है।

जो व्यक्ति मुझे अपने कार्य से सन्तोष दे दे, वह मेरे आशीर्वाद से कभी भी वंचित नहीं रह सकता। हरीलाल पास के टांघर गांव का रहने वाला है और इसने यहाँ पर दस-ग्यारह वर्षों से दैनिक मजदूर के रूप में कार्य किया है। उम्र ढ़ल जाने के कारण, अब कुछ अशक्त हो गया है। किन्तु, उस समय यह दो-तीन मजदूरों से अधिक काम करता था। यह कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित था। पूरी निष्ठा और लगन से कार्य करता था और कामचोरी बिल्कुल नहीं करता था। मैं अन्य उपस्थित मजदूरों से प्रायः पूछता रहता था- हरीलाल आ गया क्या? इस प्रकार हजारों बार मेरे मुख से हरीलाल का नाम निकला होगा। जब तक यह नहीं आ जाता था, मुझे तसल्ली नहीं होती थी। इसके कार्य से असंख्य बार मुझे राहत और सन्तोष मिला है।

सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पूर्ण निर्देशन में भगवती मानव कल्याण संगठन द्वारा प्रथम श्रमशक्ति पुरस्कार के लिए श्री हरीलाल पनिका का चुनाव किया गया, जिन्हें खचाखच भरे शिविर पण्डाल में भक्तों-शिष्यों के समक्ष, गुरुदेव जी की साक्षात प्रत्यक्ष उपस्थिति में त्रिशक्तिस्वरूपा बहन पूजा, संध्या, ज्योति योगभारती द्वारा दस हजार रुपये, एक कम्बल व संगठन की निर्धारित वेशभूषा की ड्रेस का कपड़ा व रक्षाकवच प्रदान किया गया।

श्री हरीलाल पनिका पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त व सदाचरण से परिपूर्ण धार्मिक जीवन जीते हैं तथा पिछले एक दशक से भी अधिक समय से सिद्धाश्रम में एक मजदूर के रूप में अपना योगदान देते रहे हैं। उनकी कर्तव्यनिष्ठा एवं आश्रम के प्रति समर्पण व सेवाभाव से प्रसन्न होकर सद्गुरुदेव जी ने प्रथम श्रमशक्ति पुरस्कार के लिए उन्हें चयनित मात्र ही नहीं किया, बल्कि अपने तपोबल के माध्यम से हरीलाल के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलते हुये उसे मुक्तिपथ का पूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया, जिसमें उनके इस जीवन की सुख-शान्ति के साथ ही उनका अगला नवीन जीवन एक धनाढ्य धर्मनिष्ठ परिवार में जन्म लेकर सुख-समृद्धि से परिपूर्ण जीवन प्राप्त होने का आशीर्वाद भी प्रदान किया। हरीलाल ने भी गुरुवर जी के इन आशीर्वचनों को अपने रोम-रोम में पूर्ण नमन व कृतज्ञ भाव से अंगीकृत किया।

अगले वर्ष से वितरित किये जायेंगे विभिन्न अति महत्वपूर्ण पुरस्कार
पूज्य सद्गुरुदेव जी ने भगवती मानव कल्याण संगठन के तत्वाधान में अगले वर्ष की शारदीय नवरात्रि के त्रिदिवसीय शक्ति चेतना जनजागरण शिविर से विभिन्न क्षेत्रों जैसे-जनकल्याण, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, खेल, कला, साहित्य, वीरता, उत्कृष्ट कार्यकर्ता आदि से संबंधित श्रमशक्ति समाजसेवा पुरस्कार, चेतना अंश पुरस्कार, धर्मयोद्धा चेतना अंश पुरस्कार, चेतना अंश श्रमशक्ति समाजसेवा पुरस्कार आदि विभिन्न पुरस्कारों को वितरित किये जाने का चिन्तन भी प्रदान किया।

पूज्य सद्गुरुदेव जी द्वारा चिन्तन प्रदान किया गया कि संगठन द्वारा प्रदत्त पुरस्कार उन्हीं को दिये जायेंगे, जो पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त व चरित्रवान होने के साथ ही धार्मिक भावना व सदाचरण से परिपूर्ण हों एवं आत्मकल्याण व जनकल्याण की भावना रखते होंगे। पुरस्कार प्राप्त करने वालों की पात्रता का निर्धारण उनके द्वारा पिछले कम से कम पांच से दस वर्षों के मध्य की कार्यप्रणाली के आंकलन के आधार पर किया जायेगा। ऐसे पुरस्कार शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के कार्यक्रमों में व संगठन के निर्णयानुसार कभी भी वितरित किये जा सकते हैं।