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युग परिवर्तन का शंखनाद 12, 13 Nov 2011 द्वारका (दिल्ली)

Written by Siddhashram Dhaam on .

 

युग परिवर्तन का शंखनाद

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर, डी.डी.ए ग्राउण्ड, द्वारका (दिल्ली)

दिनांक 12-13 नवम्बर 2011

 

आजकल समाज के बीच सिद्ध महापुरुषों, परमहंसों, योगऋषियों एवं तान्त्रिक-मान्त्रिकों की भरमार है। कथावाचक भी कुकुरमुत्तों की भांति फल-फूल रहे हैं, जो एक कथा कहने के बदले लाखों रुपये वसूल ले जाते हैं। आदिशंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार मठों पर पैंसठ शंकराचार्य कब्जा किये बैठे हैं। उन्हें धर्मप्रचार करना चाहिये, किन्तु वे जगद्गुरु के रूप में स्वयं को पुजवाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करते। तथाकथित ब्रह्मर्षि बीजमन्त्र बेच रहे हैं और योगऋषि सशुल्क योग शिविर लगाते हैं। शुल्क भी कुछ कम नहीं दस-दस, बीस-बीस हजार रुयये वसूले जाते हैं और योग के नाम पर खाली आसन-प्राणायाम बताये जाते हैं। ध्यान-समाधि की जानकारी कदाचित् स्वयं उन्हें नहीं है। व्यक्तिगत चर्चा के लिए भी, दो-चार मिनट के पांच-दस हजार रुपये अग्रिम रखवा लिये जाते हैं। भगवान् की कृपा दिलाने के लिए, टोटके बताकर हजारों रुपये वसूले जाते हैं।

इस प्रकार, धर्म और अध्यात्म के नाम पर समाज को बुरी तरह से छला जा रहा है। इन सभी कथित महापुरुषों के अन्दर सिद्ध-साधकों की कोई भी पात्रता नहीं है। लोगों को माया-मोह से दूर रहने का पाठ पढ़ाने वाले ये लोग स्वयं उनमें सर्वाधिक लिप्त हैं। कहने को तो मात्र दो वस्त्र पहनते हैं, किन्तु आम आदमी की अपेक्षा वे कहीं अधिक ठाठबाट एवं विलासिता का जीवन जीते हैं तथा हवाई जहाज और हैलिकॉप्टर से यात्रा करते हैं। अनीति-अधर्म के बल पर उन्होंने स्वयं को समाज में स्थापित कर लिया।

जनसामान्य का दु:ख-दर्द दूर करने के लिए, उन्हें धर्म एवं अध्यात्म के मार्ग पर बढ़ाने की बजाय, वे उनका शोषण कर रहे हैं। फलस्वरूप, समाज पतन के मार्ग पर जा रहा है और देश की सरकार अन्धी-बहरी बनी बैठी है। युग वन्दनीय धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज, जिनका अवतरण ही जनकल्याण के लिए हुआ है, इस स्थिति को मूकदर्शक बनकर देर तक देखते नहीं रह सकते।

अत: महाराजश्री ने भारत के ही नहीं, अपितु विश्वभर के समस्त धर्मगुरुओं को ससम्मान चुनौती दी है कि वे अपना सत्य परीक्षण करवाकर अपनी पात्रता प्रमाणित करें। यदि वे वास्तव में पात्र हैं, तो समाज का शोषण बन्द करके उनका नि:शुल्क आध्यात्मिक मार्गदर्शन करें, अन्यथा भगवे वस्त्र उतारकर एक सामान्य व्यक्ति की भांति जीवनयापन करें।

विज्ञान के पास 'लाई डिटैक्टर नाम का एक यन्त्र है, जिसके द्वारा यह पता किया जा सकता है कि कौन व्यक्ति सच बोल रहा है और कौन झूठ। 'इलैक्ट्रोऐंसफैलोग्राफ नामक दूसरे यन्त्र से व्यक्ति के मस्तिष्क की क्रिया तरंगें मापकर पता किया जा सकता है कि वह सो रहा है, जाग रहा है, स्वप्न देख रहा है या समाधि में है। इन दोनों यन्त्रों के माध्यम से व्यक्ति का सत्यपरीक्षण पूर्णतया सम्भव है।

एक सद्गुरु वह होता है, जिसकी कुण्डलिनी चेतना पूर्ण रूप से जाग्रत् हो और जिसने परमसत्ता के दर्शन प्राप्त करके उससे स्वयं को एकाकार किया हो। ऐसा कोई चेतनावान् तपस्वी ऋषि ही समाज का सही मार्गदर्शन कर सकता है और उसे धर्म-अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर कर सकता है। अनीति-अधर्म का नाश करके वही सत्यधर्म की स्थापना कर सकता है और समाज में सुख-शान्ति-समृद्धि ला सकता है।

दिल्ली में आयोजित 'युग परिवर्तन का शंखनाद' नामक इस शिविर का मुख्य उद्देश्य यही था कि समाज का शोषण कर रहे धर्मगुरुओं का सत्यपरीक्षण के द्वारा पर्दाफाश करके उन्हें अलग किया जाय। परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान ने महीनों पहले देश-विदेश के समस्त धर्मगुरुओं का ससम्मान आह्वान किया था कि इस शिविर में सम्मिलित होकर अपना सत्य-परीक्षण कराएं। किन्तु, जैसा कि अनुमान था, कोई भी धर्मगुरु आगे नहीं आया। वैसे तो सामान्यतया ऐसे शिविरों का उद्देश्य जनजागरण के द्वारा जन-जन के हृदय में प्रकृतिसत्ता माता भगवती की चेतना जाग्रत् करने एवं समान को नशामुक्त, मांसाहारमुक्त एवं चरित्रवान जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करना है। प्रत्येक वर्ष की भांति, इस वर्ष इस अलौकिक शिविर को आयोजित करने का सौभाग्य दिल्ली प्रान्त को प्राप्त हुआ। यह शिविर 12-13 नवम्बर को दिल्ली के डी.डी.ए ग्राउण्ड, सेक्टर-10, निकट मेट्रो रेलवे स्टेशन, द्वारका में आयोजित किया गया था।

प्रारम्भिक तैयारियां

शिविर आयोजन से लगभग एक वर्ष पहले से ही संगठन के हजारों कार्यकर्ता इसकी तैयारियों में जुट गये थे। शिविर की वास्तविक तिथियों से एक महीना पहले, उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं अन्य प्रान्तों के सैकड़ों सक्रिय सदस्य भी वहां पहुंचकर इस कार्य में जुड़ गये थे। उन्होंने घर-घर जाकर इस शिविर से सम्बन्धित 'युग परिवर्तन का शंखनाद नामक पैम्पलेट्स वितरित करते हुये आमंत्रित किया। इसके अतिरिक्त, जगह-जगह पर होर्डिंग्स भी लगाए गये थे। इस प्रकार, इस शिविर के आयोजन का व्यापक प्रचार हुआ था।

गत वर्ष तक, समाज के बीच लगाए जाने वाले शिविरों में सम्मिलित होने के लिए शिविरार्थीगण शिविर स्थल तक जनजागरण रैली के रूप में पहुंचते थे। इससे रास्ते में पडऩे वाले नगरों में यातायात बाधित होने के कारण आम आदमी को परेशानी होती थी। अत: इस शिविर में सब लोग अपनी-अपनी व्यवस्था से शिविर स्थल तक पहुँचे। दिल्ली के तीनों अन्तरराज्यीय बस अड्डों तथा तीनों मुख्य रेलवे स्टेशन पर पहुँचने वाले शिविरार्थियों की सुविधा के लिए वहाँ पर कुछ स्थानीय बसों की व्यवस्था की गई थी, जो वहाँ से उन्हें शिविर स्थल पर पहुँचाती थी। इन स्थानों पर कुछ कार्यकर्ता भी मार्गदर्शन के लिए नियुक्त किये गये थे।

परम पूज्य गुरुवरश्री ने सिद्धाश्रम से दिनांक 09 नवम्बर को प्रात: अपनी यात्रा प्रारम्भ की। एक रात ग्वालियर में विश्राम करने के बाद पुन: प्रस्थान करके दिनांक 11 नवम्बर को दिल्ली में आपश्री का शुभागमन हुआ। इस प्रकार, शिविर से एक दिन पहले पहुंचकर महाराजश्री ने विभिन्न तैयारियों का जायजा लिया और कार्यकर्ताओं को तदनुसार निर्देशित किया। इस यात्रा के मध्य रास्ते में जगह-जगह पर हजारों शिष्यों, भक्तों एवं श्रद्धालुओं ने गुरुवरश्री का स्वागत-अभिनन्दन एवं वन्दन किया।

शिविर के आयोजन के लिए वृहद पण्डाल की व्यवस्था की गई थी। इसके भीतर माता भगवती की दिव्य छवि के साथ परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् के दिव्यासन के लिए भव्य मंच का निर्माण किया गया था, जिस पर सुन्दर कलश स्थापित किया गया था और अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित की गई।

विभिन्न व्यवस्थाएं

किसी महानगर में, विशेष रूप से देश की राजधानी दिल्ली जैसे स्थान पर, ऐसे महाशिविर के वृहद् कार्यक्रम को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। फिर भी, इस दु:साध्य कार्य को सफल बनाने में दिल्ली सहित देशभर से पहुँचे भगवती मानव कल्याण संगठन के कई हजार समर्पित कार्यकर्ताओं का अभूतपूर्व योगदान रहा। इन सभी ने मिलकर आवासीय, शान्ति एवं सुरक्षा, भोजन, पण्डाल, जनसम्पर्क कार्यालय, स्टॉल, बिजली एवं पेयजल व्यवस्थाओं तथा प्रसाद वितरण आदि का कार्य पूर्ण निष्ठा एवं लगन के साथ किया।

शिविर के प्रथम दिन प्रात: सात से नौ बजे तक प्रमुख कार्यकर्ताओं के द्वारा शिष्यों, श्रद्धालुओं और माँ के भक्तों को मन्त्र जाप तथा ध्यान साधना का क्रम सिखाया गया एवं शिविर के दोनों दिन अपराह्न दो से तीन बजे तक विभिन्न क्षेत्रों से पधारे माँ के भक्तों के द्वारा भावगीत प्रस्तुत किये गये। सायं तीन से पांच बजे तक श्रोताओं ने परम पूज्य गुरुवरश्री के चेतनात्मक प्रवचनों का रसपान किया। सायं पांच से छ: बजे तक सभी ने दिव्य आरती का लाभ लिया, जिसे प्रकृतिस्वरूपा तीनों बहनों, पूजा, संध्या एवं ज्योति योगभारती जी ने सबकी ओर से सम्पन्न किया। तत्पश्चात्, महाराजश्री की चरण पादुकाओं को नमन के उपरान्त प्रसाद ग्रहण किया।

अपराह्न इस कार्यक्रम का जीवन्त प्रसारण ढाई बजे से साढ़े छ: बजे तक जी-जागरण टी.वी. चैनल पर किया गया, जिससे वे लोग इसका आनन्द अपने घर बैठे ही ले सकें, जो किन्हीं अपरिहार्य कारणों से इस शिविर में उपस्थित नहीं हो सके।

प्रथम दिवस

दिनांक 12 नवम्बर 2011 को शिविर पण्डाल अपराह्न दो बजे से पहले ही खचाखच भर चुका था। भक्तगण अपने-अपने भावगीत प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक पौने तीन बजे माँ-गुरुवर के जयकारों के मध्य परम पूजनीय श्री गुरुदेव भगवान् का पदार्पण हुआ। उनके मंचासीन होते ही बहन पूजा, संध्या और ज्योति योगभारती ने उपस्थित जनसमूह की ओर से उनके चरणकमल पखारे तथा वन्दन किया। तदुपरान्त, भगवती मानव कल्याण संगठन की केन्द्रीय महासचिव बहन पूजा एवं संध्या योगभारती ने अति संक्षिप्त चिन्तन दिया। उन्होंने कहा-
परम पूज्य गुरुवरश्री के आध्यात्मिक चिन्तनों को सुनना बहुत जरूरी है, मगर आत्मकल्याण तो उन पर अमल करने से ही होगा। समुद्र तट पर कंकड़-पत्थर तो बटोरे जा सकते हैं, किन्तु यदि हीरे-मोती प्राप्त करने हैं, तो गहराई में जाना पड़ेगा। अब वे क्षण आ चुके हैं, जब हमें गुरुवरश्री के चिन्तन सुनने को मिलेंगे। युग परिवर्तन का यह शंखनाद उस धर्मयुद्ध का द्योतक है, जो हमने गांव-गांव से प्रारम्भ किया है। इस समय हम लोग किसी सामान्य पुरुष या धर्मगुरु के समक्ष नहीं बैठे हैं। हम परम सिद्धाश्रम धाम के ब्रह्मर्षि स्वामी सच्चिदानन्द के अवतार के सामने बैठे हैं, जिन्होंने मानव शरीर धारण किया है। यदि आपको यहां पर सत्य नजर आता है, तो हमारे साथ कदम मिलाकर चलिये, नहीं तो आप किसी भी मार्ग में जाने के लिए स्वतन्त्र हैं।

तत्पश्चात्, अपना पूर्ण आशीर्वाद समर्पित करके परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् ने अपने उद्बोधन में कहा--

मैं यहां पर आपको अन्य धर्मगुरुओं की भांति कथा-कहानियां सुनाने नहीं, अपितु आपको सत्य के मार्ग पर बढ़ाने आया हूँ, जिसका राही मैं स्वयं हूँ। इस कलिकाल में सत्य की आवाज को कोई सुनना ही नहीं चाहता, सत्य के मार्ग पर कोई बढऩा ही नहीं चाहता। मैं यदि चाहता, तो अन्य धर्मगुरुओं की तरह जगह-जगह शिविर आयोजित करके पैसा एकत्रित कर लेता और अब तक एक भव्य आश्रम का निर्माण करा लेता। किन्तु, मेरा मार्ग उनके विपरीत है।

जब मैंने सत्रह-अट्ठारह वर्ष पहले अपने 'मैं को जानने का चिन्तन प्रदान किया, तो लोगों ने मुझे अहंकारी कहा था। मैं शब्द का प्रयोग सभी करते हैं, पर वह भौतिक होता है। उसके आध्यात्मिक रूप को तो कोई जानना ही नहीं चाहता। उसे जान जाओगे, तो 'माँ तुमसे दूर नहीं रहेंगी। किन्तु, 'माँ को जानने का प्रयास नहीं किया जाता , जिसने सबके अन्दर क्षमता स्थापित की है।

जिस प्रकार एक माता बता सकती है कि तुम्हारा पिता कौन है, उस प्रकार एक ऋषि बताता है कि तुम्हारी आत्मा की जननी माता अदिशक्ति जगत जननी जगदम्बा हैं। इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को उन्हीं ने उत्पन्न किया है।

लोग कहते हैं-- 'माया महाठगिनी मैं जानी, किन्तु मैं कहता हूँ-- 'काया महाठगिनी मैं जानी। इसे तो सुख चाहिये और यदि इसे सुख देते रहोगे, तो निश्चित ही पतन की ओर जाओगे।

सुदामा दरिद्र नहीं था। दरिद्र तो, वास्तव में, वे लोग हैं, जो उसे दरिद्र कहते हैं। वह एक सिद्ध साधक था, किन्तु अन्यायी-अधर्मी राजाओं के सामने झुकता नहीं था, भले ही भूखों रहना पड़े। तुम भी यदि साधना करो, तो भगवान को उपस्थित होना ही पड़ेगा। 'हम बदलेंगे, युग बदलेगा- यह नारा लगाने मात्र से युग नहीं बदलेगा। उसके लिए निश्चित रूप से अपने आपको बदलना होगा।

आज कथावाचकों को भगवान कृष्ण और भगवती देवी राधा के बीच दिव्य प्रेम के स्थान पर वासना नजर आती है। फलस्वरूप, जन्माष्टमी के अवसर पर वे बारबालाओं को बुलाकर डान्स कराते हैं। भावनावान् भक्तों की रक्षा करना मेरा धर्म, कर्म एवं कर्तव्य है, जिन्हें वे कथा-वाचक धर्माचार्य लूट रहे हैं। मेरी चुनौती ऐसे ही धर्माचार्यों के लिए है, जो समाज को छल रहे हैं और दिग्भ्रमित कर रहे हैं।
प्रजातन्त्र के चार स्तम्भ हैं-विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रचार मीडिया। इन चारों के मूल में यदि धर्म नहीं है, तो वे चारों कभी भी धराशायी हो सकते हैं। आज स्थिति न्यूनाधिक यही है और हमारा लोकतन्त्र खतरे में है।

साधु-सन्तों का जीवन जीने वालों का मैं सम्मान करता हूँ, किन्तु आपको सिद्ध कहकर सामज को लूटने वालों को मैं ठोकर भी मारता हूँ। न तो मैं किसी साधु-सन्त के मंच पर बैठता हूँ और न ही किसी को अपने मंच पर बैठाता हूँ। न तो मैं किसी का माल्यार्पण करता हूँ और न किसी के द्वारा अपना माल्यार्पण कराता हूँ।

आज के ये तथाकथित योगऋषि डॉक्टरों को गाली देते हैं। और, खुद क्या कर रहे हैं? योगपीठ के नाम पर पहले तो पैसे ठगे, उसके बाद आयुर्वेदिक दवाइयों के उद्योग लगा लिए। समाज में कोई इस डर से उनके विरुद्ध आवाज नहीं उठाता कि मुकदमा ठोक दिया जाएगा। किन्तु, मैं एक ऋषि हूँ। मेरी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। कोई बताए तो सही कि उनके योग और उद्योग से किसी गरीब को क्या लाभ मिल रहा है? ये लोग कहते हैं कि अच्छे-अच्छे सेब तो बाजार में बेच दीजिए और जिन्हें जानवर भी न खाते हों, उन्हें हमें बेच दीजिए। ऐसे सेबों का मुरब्बा बनाकर बाजार में बेचा जाता है। मैं कोई भी बात निराधार नहीं कहता। ऐसी सब बातों की रिकॉर्डिंग मेरे पास हैं।

एैसे योगाचार्य कहते हैं कि वह मात्र एक कटोरी सब्जी खाते हैं। अरे, जब फल-जूस, मेवा, मिष्ठान, च्यवनप्राश, कैण्डी आदि खाते घूमोगे, तो भूख कहां रहेगी? योग के लिए कहते हैं कि इससे सारे रोग मिट जाते हैं, तो आयुर्वेदिक दवाइयों की फैक्टरी किसलिए लगाई गई? मात्र सात दिन के अनशन के बाद उनकी क्या हालत हो गई? धिक्कार है ऐसे योगगुरु को, जो मीडिया के सामने फफक-फफककर रोने लगे! ऐसे योगियों के लिए मेरे अन्दर ज्वाला धधक रही है। मुझे वेदना तब हुई, जब वह अपने आपको 'राष्ट्रनायक कहने लगे। मैं स्वयं और मेरे संगठन के लोग इसे स्वीकार नहीं करते। यह राष्ट्र का घोर अपमान है। इससे पहले वह 'भारतरत्न बनने का प्रयास करते रहे।

मैं किसी भी राजनैतिक दल का पिट्ठू नहीं हूँ। हर पार्टी में ईमानदार लोग हैं, किन्तु उनमें पचहत्तर प्रतिशत लोग अपराधी, चरित्रहीन और पतित हैं। यदि कोई भी पार्टी मेरी ग्यारह मांगों को क्रियान्वित करने के लिए संकल्पबद्ध हो जाय, तो वह चाहे कांग्रेस हो या भाजपा हो, मैं अगले चुनाव में सत्ता उसके हाथ में दिला सकता हूँ।

मैं सभी राजनेताओं का आवाहन करता हूँ कि समाजसेवा के मार्ग पर चलें, सच्चाई के मार्ग पर चलें। धनवान् नहीं, धर्मवान् बनें। तब धन पीछे-पीछे दौड़ेगा। इस देश को 'सोने की चिडिय़ा नहीं, 'चेतनावानों का राजहंस बनाना है।

राजनीति सदैव धर्म के चरणों में रही है। किन्तु, आज धर्मगुरु राजनेताओं के पीछे दुम हिलाते हैं। मैं मंत्रियों से कुछ लेने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें कुछ देने के लिए बुलाता हूँ। मेरा कहना है कि सत्य के मार्ग पर चलो। अनीति-अन्याय-अधर्म का पैसा लेने की अपेक्षा भूखों रहो।

एक तथाकथित ब्रह्मर्षि बीज मन्त्र बेचते हैं और उन्हें गोपनीय रखने को कहते हैं। उनका कहना है कि ब्रह्मा-विष्णु-महेश के दर्शन इस प्रकार करते हैं, जैसे वह तुम्हें देख रहे हैं। यदि उनके हाथ में एक कील भी गाड़ दी जाय, तो उन्हें पता नहीं चलेगा। यह बात वह तब कह रहे थे, जब उन्होंने सर्दी से बचने के लिए कई-कई कपड़े पहन रखे थे और एक कनटोपा भी लगा रखा था। श्रद्धावान् और भावनावान् लोगों में किसी को भी यह कहने का साहस नहीं हुआ कि सर्दी तो आपको बर्दाश्त नहीं होती, तो कील को कैसे सहोगे? इस प्रकार, लोगों को बेवकूफ बनाया जाता है। आश्चर्य की बात है कि इस पर सरकार और शंकराचार्यों तक के मुंह बन्द हैं।

कहीं पर भगवान् की कृपा दिलाने के विचित्र तरीके बताए जाते हैं। किसी को कहा जाता है कि केला खाओ, तो कृपा आने लगेगी। किसी को बताया जाता है कि कृपा प्राप्त करनी है, तो बेल्ट उतार दो। मानों उन्होंने भगवान् की कृपा दिलाने की एजेन्सी ले रखी है। ऐसे धूर्त-लम्पट लोग नितान्त ज्ञानशून्य हैं और यदि उनके पास कुछ है, तो सत्यपरीक्षण के लिए आयें।

आज समूचा युवावर्ग पतन के मार्ग पर जा रहा है। टी.वी. पर उन्हें कामुकता और अश्लीलता परोसी जा रही है। इससे उनमें विषय-वासना जाग्रत् होती है, जिसके फलस्वरूप उनका ओज-तेज क्षीण हो रहा है। राजनेता उन्हें उग्रवाद में धकेल रहे हैं। यदि युवाओं को सही दिशा न दी गई, तो हमारे राष्ट्र का भविष्य खतरे में होगा। इसलिए उन्हें सत्य के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करना होगा।

मैं साधु-सन्तों का आवाहन करता हूँ कि वे आएं और भगवती मानव कल्याण संगठन से जुड़कर राष्ट्र के उत्थान का कार्य करें। एक तरफ बैठकर भगवान् का नाम लेने से कुछ नहीं होगा। जीवन बहुमुखी होना चाहिये। जनकल्याण का कार्य अधिकाधिक करें। इसी में आत्मकल्याण निहित है। सेवा-समर्पण-निष्ठा का मार्ग अपनाओ।

साधना से सब कुछ सम्भव है। मैंने स्वयं अपनी साधना के बल पर असम्भव से असम्भव कार्य किये हैं। आज भी मेरी चुनौती है। सारे धर्मगुरु एक पलड़े पर खड़े हो जाएं और सब मिलकर कोई भी एक असंभव कार्य कर दें। यदि वे नहीं कर पाते, तो मैं करके दिखाऊँगा।

स्विस बैंक में जमा काला धन वापस आ जाय, तो बड़ी अच्छी बात है किन्तु, उसे भी हमारे बेईमान नेता खा जाएंगे। इसलिए, जनता को जागरूक और ईमानदार बनाओ। उत्तर प्रदेश के चुनाव में एक राजनैतिक दल द्वारा एक नारा 'उठो-जागो तैयार किया गया है। किन्तु, उन्हें अपने नारे में सुधार करना चाहिये कि 'जागो-उठो, और सत्य के मार्ग पर बढ़ो। क्योंकि जो जगा ही न हो, वह क्या उठेगा।

आज के धर्मगुरु समस्या आने पर रोने लगते हैं। किन्तु, मैं लोगों के दु:खों के कारण तो भले ही रोता हूँ, मगर इस भूतल पर ऐसा कोई दु:ख-तकलीफ नहीं है, जिसके कारण मैं रो पडूं। एक चेतनावान् योगी तो समस्याएं आने पर और अधिक चेतन होता है।

जीवन में बदलाव लाना चाहिये। पारस के अन्दर लोहे को सोना बनाने की सामथ्र्य होती है। किन्तु, मैं ऐसे साधक तैयार कर रहा हूँ, जो लोगों को अपने समान बना रहे हैं। मैं योगियों की आलोचना अपने सम्मान को बढ़ाने के लिए नहीं करता हूँ। इसका उद्देश्य सत्यधर्म की स्थापना करना है।

आज के धर्मगुरु फोन पर दीक्षा दे देते हैं। मंत्री आ जाय, तो दौड़कर जाते हैं। और, दीक्षा भी बिक रही है-इक्यावन हजार की, एक लाख की। मैं नितान्त नि:शुल्क दीक्षा देता हूँ। मेरा शिष्य वही बनेगा, जो पूर्ण रूप से नशामुक्त-मांसाहारमुक्त एवं चरित्रावान् होने का संकल्प लेगा।

अगला शक्ति चेतना जनजागरण शिविर बहुत जल्दी 11-12 फरवरी 2012 को सागर संभाग में होगा तथा 28-29 नवम्बर को श्री चित्रकूट धाम में होगा। 16-17 फरवरी 2013 को छत्तीसगढ़ में तथा 9-10 नवम्बर 2013 को यमुनानगर (हरियाणा) में शिविर होंगे। इनके अतिरिक्त, एक शिविर कभी न कभी नेपाल में भी प्रदान करने का विचार करूंगा।

आज यहाँ से युग परिवर्तन का शंखनाद होगा। यह कोई सामान्य शंखनाद नहीं होगा, बल्कि धर्मयुद्ध का उद्घोष होगा। यह युग परिवर्तन के सन्धिकाल का शंखनाद है। इसे सुनो और नित्यप्रति अपने घरों में करो। यह शंखनाद तब तक जारी रहेगा, जब तक हम इस धर्मयुद्ध को जीत नहीं लेते। और, हमारी जीत निश्चित है।

मैं अपने आपको प्रचार-प्रसार से दूर रखता हूँ, किन्तु सत्य की आवाज उठाता हूँ। मीडिया का मेरे बारे में कुछ भी विचार हो, मगर उनसे मेरी अपेक्षा है कि एक बार दु:खी समाज की ओर अवश्य देखें और सच्चाई की आवश्यकता को महसूस करें।

अपनी बच्चियों का जीवन मैंने धनवान् नहीं धर्मवान् बनाया है। मैंने 'माँ के चरणों में प्रार्थना करके पुत्रियां प्राप्त की हैं। पुरुषों के साथ मैं नारी समाज को भी जाग्रत् कर रहा हूँ। अपनी पुत्रियों का जीवन भी मैंने समाजसेवा के लिए समर्पित किया है।

दिल्ली दिलवालों की है- इसे भी हम यही सन्देश देने आए हैं कि रात-दिन धन के पीछे मत दौड़ो। थोड़ा रुककर सोचो कि तुम्हारे जीवन का लक्ष्य क्या है? धन-सम्पत्ति की निरन्तर बढ़ती चाह ने तुम्हारी सुख-शान्ति को छीन लिया है। तुम्हारे पास पहले ही काफी कुछ है। थोड़ा अपने से नीचे के समाज को देखो और उनकी सेवा-सहायता में समय दो। तुम्हें आनन्द और तृप्ति मिलेगी।

तदुपरान्त, परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् ने अपने हाथों में शंख लेकर शंखध्वनि करते हुये युग परिवर्तन का शंखनाद किया, जिसके साथ पण्डाल में उपस्थित लोगों की शंखध्वनि भी जुड़ गई। लगा, जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इस नाद से गुंजायमान हो उठा हो।
अब त्रिशक्तिस्वरूपा तीनों बहनों, पूजा-संध्या-ज्योति योगभारती की अगुवाई में दिव्य आरती का क्रम सम्पन्न हुआ। सबने क्रमबद्ध ढ़ंग से महाराजश्री की चरणपादुकाओं को नमन किया। गुरुवरश्री मंच पर तब तक विराजमान रहे, जब तक एक-एक व्यक्ति ने नमन नहीं कर लिया। सबने प्रसाद ग्रहण किया तथा रात्रिभोजन के उपरान्त विश्राम किया।

द्वितीय दिवस- प्रथम सत्र

दिनांक 13 नवम्बर, 2011 को इस शिविर का अन्तिम दिन था। उस दिन प्रात: आठ बजे से गुरुदीक्षा का कार्यक्रम था। इस अवसर पर कुल मिलाकर लगभग दस हजार पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने दीक्षा प्राप्त की।

प्रात: आठ बजे 'माँ-गुरुवर के जयकारों के मध्य परम पूजनीय श्री गुरुदेव भगवान् का पण्डाल में शुभागमन हुआ। मंचासीन होने के उपरान्त, आपश्री ने सबको अपना पूर्ण आशीर्वाद समर्पित किया तथा दीक्षा प्रदान करने से पूर्ण संक्षिप्त सा चिन्तन दिया:

गुरु-शिष्य का रिश्ता इस भूतल पर सभी रिश्तों में सर्वश्रेष्ठ होता है। यह प्रकृतिसत्ता की कड़ी का रिश्ता है, जो भावना, निष्ठा और समर्पण पर आधारित होता है। बांकी सब रिश्ते भौतिकता से जुड़े होते हैं। गुरु अपने शिष्य के कल्याण के लिए चिन्तन करता रहता है। वह हर पल शिष्यों के साथ रहता है।

चेतनावान् पूर्ण गुरु अपनी असंख्य चेतना तरंगों के माध्यम से अनेक रूप धारण कर सकता है। सत्य का ज्ञान कराना मेरा धर्म और कर्म है। विद्यालय में प्रवेश के उपरान्त, अध्ययन करना अनिवार्य है, नहीं तो सफलता नहीं मिलेगी। इसी प्रकार दीक्षा प्राप्त करने के बाद नित्य साधना आवश्यक है। तभी आप लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। खाली दीक्षा प्राप्त करने से कुछ नहीं होगा।

गुरुदीक्षा प्राप्त करते ही स्वत: आप भगवती मानव कल्याण संगठन के सम्मानित सदस्य बन जाएंगे। तब आप अकेले नहीं रहेंगे, बल्कि लाखों भाई-बहनों के साथ जुड़ जाएंगे।

नशा-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीने वालों का कभी भी पतन नहीं होता। इससे मन:स्थिति निरन्तर प्रबल होती चली जाती है। आज का समाज मुझे समझ नहीं पा रहा है। किन्तु, जब उसे मेरी वास्तविकता का पता चलेगा, तो उन्हें अफसोस करने के इलावा कुछ नहीं मिलेगा।

आज की इस दीक्षा के विषय में आप लोग अपनी डायरी में नोट करके रख लेना, ताकि आपकी आने वाली पीढिय़ां जान सकें कि उनके पूर्वजों ने शक्तिपुत्र जी महाराज से दीक्षा ली थी। सत्य-पथ का राही बनाना मेरा कार्य है। मैं सतयुग के मार्ग को प्रशस्त करने आया हूँ।

जब भी साधना में बैठें, मेरुदण्ड सीधी करके बैठें। इससे सुषुम्ना नाड़ी चैतन्य रहती है, सात्त्विकता बढ़ती है और मन एकाग्र होता है। इसका सदैव अभ्यास करें और कपड़े सदैव ढ़ीले ही पहनकर बैठें।

समाज में दीक्षा से पहले गुरु अपनी पूजा करवाता है, जब कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। गुरु अपने को पुजवाता नहीं, वह तो कुछ प्रदान करने आता है। आप मेरे हैं, मैं आपका हूँ। गुरु रिश्ते की इस डोर को कभी तोड़ता नहीं है, जब कि आप इसे तोडऩे के लिए स्वतन्त्र हैं। जो भी व्यक्ति दो कदम मेरी ओर बढ़ता है, उसे मैं दस कदम आगे बढ़कर अपनी ओर खींच लेता हूँ। साथ ही, जो दो कदम दूर जाने की सोचता है, उसे मैं दूर भी फेंक देता हूँ।
अब तीन-तीन बार 'माँ और ऊँ' का क्रमिक उच्चारण किया गया और एक संकल्प बुलवाया गया। इस संकल्प में ही सब सार छुपा है। यदि इसका पालन करेंगे, तो गुरु सदैव आपके साथ रहेगा। इसके बाद, विघ्रविनाशक गणपति, बजरंगबली और भैरवदेव के बीज मंत्रों तथा गुरुमंत्र एवं चेतनामंत्र का गुरुवरश्री  ने तीन-तीन बार उच्चारण करवाया और अपना उद्बोधन जारी रखा:

इन मंत्रों का जाप किसी भी क्रम में किया जा सकता है। देवशक्तियों में कोई भेद नहीं होता। किन्तु, जब सामूहिक रूप से करें, तो निश्चित क्रम में ही होना चाहिये।

अपने घर में एक पूजन कक्ष बनाएं। यदि अलग से व्यवस्था न हो, तो बैडरूम में ही किसी अलमारी, आले या कार्निस पर बना सकते हैं। दिन में दो बार, सुबह-शाम साधना करें। इससे 'माँ और सहायक शक्तियों का आशीर्वाद प्राप्त होगा। प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में 'माँ - ऊँ'  का क्रमिक उच्चारण दस-पन्द्रह मिनट तक अवश्य करें। इससे सात्त्विक तरंगें जाग्रत् होंगी और अनेक समस्यायें स्वत: दूर हो जाएंगी। एक वर्ष के भीतर आश्रम आकर मूलध्वज पर नमन करें और श्री दुर्गा चालीसा पाठ करें।

युग परिवर्तन का जो शंखनाद किया गया है, उसके भागीदार बनें। मेरा सच्चा शिष्य वही है, जो आत्मकल्याण के साथ-साथ जनकल्याण के बारे में भी सोचता और करता है।

आपको हर पल सुधार की ओर बढऩा है। अपने मोबाईल में गुरुमन्त्र, चेतना मन्त्र या 'माँ के भजन फीड करें और फिल्मी गाने हटा दें। इसी प्रकार, अश्लील फोटो हटाकर 'माँ-गुरुवर की छावियां डालें।

मैं आप सभी को मन-वचन-कर्म से अपना शिष्य स्वीकार कर चुका हूँ। मेरा आशीर्वाद सदैव आपके साथ रहेगा।

अन्त में, परम पूज्य गुरुदेव जी ने अपना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया। अब चरणपादुकाओं को नमन करते समय सबको नि:शुल्क शक्तिजल प्रदान किया गया। साथ ही, गुरुदीक्षा पत्रक भरा गया।

द्वितीय दिवस-द्वितीय सत्र

दिनांक 13 नवम्बर, 2011 को इस शिविर के अन्तिम दिन के द्वितीय सत्र में अपराह्न दो बजे से भावगीतों का क्रम प्रारम्भ हुआ। निर्धारित समय पर 'माँ-गुरुवर के जयकारों के मध्य परम पूजनीय सद्गुरुदेव भगवान् का पण्डाल में पदार्पण हुआ। मंचासीन होते ही आपश्री के पावन चरणकमलों का प्रक्षालन एवं वन्दन हुआ और अपना पूर्ण आशीर्वाद समर्पित करके आपका चिन्तन प्रारम्भ हुआ:
आज जिधर देखो, उधर अनीति-अन्याय-अधर्म तथा भय-भूख-भ्रष्टाचार नजर आता है।  सबसे सशक्त सहारा माता आदिशक्ति जगत जननी जगदम्बा का है, जिन्हें देवधिदेवों ने भी स्मरण किया है। यदि हम अपनी समृद्धि चाहते हैं, तो उनकी साधना से ही प्राप्त कर सकते हैं, जो सबसे सरल-सुगम है। 'माँ अपने बच्चों की गलती को भी क्षमा करती रहती है।

हम लोग उनके अंश हैं, उनके पुत्र हैं। यह सम्पूर्ण सृष्टि भी उन्हीं का अंश है। इसलिए सबकी इष्ट वही हैं। वह अजर-अमर-अविनाशी हैं। यदि एक बच्चे को उसकी माँ से दूर ले जाओ, तो वह दु:खी होता चला जाता है। इसी प्रकार, आप अपनी मूल जननी से दूर चले गए हैं। इसीलिए, दु:खी हैं। मैं दूसरे देवी-देवताओं की आराधना के लिए मना नहीं करता। वे भी सहायक शक्तियां हैं। आप जब भी उनकी आराधना करें, तो उनसे प्रार्थना करें कि हम शीघ्र ही अपनी जननी से मिलें।

वैसे तो माता भगवती के अनेक स्वरूप हैं, किन्तु इस कलिकाल में महिषमर्दिनी की आराधना सबसे अधिक फलदायी है। उसमें सभी देवी-देवताओं की आराधना निहित है। मैंने सबसे सरल भक्तिमार्ग प्रदान किया है। 'माँ-ऊँ' के क्रमिक उच्चारण से पूरे शरीर का मन्थन होता है।

आप खाली पूजा-पाठ से ही साधक नहीं बन जाते। पूर्णत्व प्राप्त करने के लिए परोपकारी होना, समाजसेवा करना जरूरी है। मानवीय मूल्यों की स्थापना करना जरूरी है। अपना पेट तो कुत्ते-बिल्ली भी भर लेते हैं। किन्तु, आप तो मानव हैं। आपको प्राणिमात्र के कल्याण में लगना चाहिये।

देवत्व जीवन की पूर्णता नहीं है। जीवन की पूर्णता ऋषित्व है, जिसे मानव जीवन में ही प्राप्त किया जा सकता है। देवता भी इसे प्राप्त नहीं कर सकते। इसे गृहस्थ में रहकर भी प्राप्त किया जा सकता है। मैं भी तो गृहस्थ का जीवन जीता हूँ। आवश्यक है संतानोत्पत्ति के उपरान्त पूर्ण ब्रह्मचर्य का जीवन जीने की।

एक बैडरूम की संस्कृति से बचो। बच्चों को आया के हवाले मत करो। उन्हें स्तनपान कराओ। उनके हाथ में बोतल मत थमाओ, नहीं तो बड़े होकर यदि वे बड़ी बोतल पकड़ लेते हैं, तो क्या गलती करते हैं?

बेटा-बेटी का भेदभाव भूल जाओ। स्वयं मैंने इस भेदभाव को कभी नहीं माना है। पुत्र से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। यह अज्ञानता है। यदि ऐसा मानते हो कि उसके द्वारा कुछ पूजा-पाठ कर लेने से मुक्ति होती है, तो अपने जीते जी स्वयं पूजा-पाठ क्यों नहीं कर लेते? इससे उसके द्वारा पूजा-पाठ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैसे पुत्र की अपेक्षा पुत्री माँ-बाप की अधिक सेवा करती है। उसे पुत्र के समान मानकर तो देखो।

सबसे पहले आप साधक की श्रेणी को प्राप्त करो। शुरू-शुरू में लोग आपको हेय दृष्टि से देखते हैं, किन्तु जल्दी ही एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब सभी आपको सम्मान की दृष्टि से देखेंगे।

भौतिकता में डूबे लोग राक्षस नहीं, तो और क्या हैं? एक-एक रात में वे अय्याशी पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देते हैं। मदिरा पान करते हैं, मांस का भक्षण करते हैं और रंग-रेलियां होती हैं। राक्षस भी तो यही करते थे। ऐसे लोगों को सुधारना पड़ेगा। हमारा भगवती मानव कल्याण संगठन उन्हें सुधारकर रहेगा। युग परिवर्तन का शंखनाद इसीलिए किया गया है।

वह हर कार्य धर्म है, जिसे करने से प्रकृतिसत्ता से हमारी आत्मा निकटता बढ़ती है और ऐसा हर कार्य अधर्म है, जिसे करने से प्रकृतिसत्ता से हमारी आत्मा की दूरी बढ़ती है। इसलिए, धर्मपथ पर चलो। योग ही जीवन है और वियोग ही मृत्यु है। परमसत्ता से जितना वियोग हो रहा है, उतना ही व्यक्ति मृत्युतुल्य कष्ट भोग हो रहा है।

कुण्डलिनी जागरण ही जीवन की मुक्ति है। साधना के अतिरिक्त इसका अन्य कोई मार्ग नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति का उपयोग पांच प्रतिशत से अधिक नहीं करता। किन्तु जैसे-जैसे साधना करोगे, कार्यक्षमता बढ़ती जाएगी। आज के धर्मगुरु साधना पथ पर बढऩा ही नहीं चाहते। सब भौतिकता में लिप्त हैं।

मैं जो आवाज उठाता हूँ, उसे पूरे जोर से इसलिए उठाता हूँ कि मैंने समाज को दु:खों से मुक्त करने का संकल्प लिया है। यदि ऐसा न होता, तो मैं आज हिमालय की कन्दराओं में बैठा होता।

आज हमारे राजनेताओं की अन्तरात्मा मर चुकी है। उन्हें भी सुधारना है। इस कलिकाल को समूल नष्ट करना है, तो हमें साधक बनना ही पड़ेगा और 'माँ की आराधना करना ही पड़ेगा। एक योगी की क्षमता सामान्य नहीं होती। मैं रेगिस्तान में बैठकर करोड़ों लोगों को भोजन करा सकता हूँ। छठवें महाशक्ति यज्ञ में मैंने इस बात का एहसास कराया था। वहां पर मात्र पांच हजार लोगों के खाने की व्यवस्था थी। वहीं भोजन पच्चीस हजार लोगों ने किया, किन्तु फिर भी समाप्त नहीं हुआ। वहीं पर लोगों को मैंने 'माँ की छवि अपने शरीर में दिखाई थी और मरणासन्न व्यक्तियों को यज्ञ की ऊर्जा से पूर्ण स्वस्थ करके भेजा था।

आज भ्रष्टाचार एक उद्योग बन चुका है और इसकी मूल जड़ राजनीति है, जहाँ पर निन्नानवे प्रतिशत लोग भ्रष्टाचार में डूबे हैं। ये लोग हर चुनाव के पहले भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात करते हैं, किन्तु उनसे इसकी कामना करना बेकार है। सब थाने बिकते हैं। पैसे अधिकारियों के माध्यम से मंत्रियों तक पहुंचते हैं। यह पैसा बड़ी ईमानदारी से बंटता है। यदि ईमानदारी कहीं है, तो यहां पर है। भ्रष्टाचार के कारण अनेक जजों को हटाया गया है, किन्तु इसका कारण कोई भी खोजना नहीं चाहता।

भ्रष्ट राजनेताओं, धर्मगुरुओं और उद्योगपतियों का एक नेटवर्क बन गया है। ये तीनों मिलकर समाज का खून चूस रहे हैं और एक मंच पर बैठकर एक-दूसरे का माल्यार्पण करते हैं। धर्मगुरुओं की दान के द्वारा हुई आमदनी पर टैक्स की छूट क्यों दी जाती है? यह प्रावधान समाप्त होना चाहिये। यदि उस आमदनी पर टैक्स लगा दिया जाय, तो देश की गरीबी मिट जाएगी।

समाज को सच्चाई-ईमानदारी का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है। इस पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। हमें न तो हिंसा करनी है और न ही सहनी है। हिंसा सहना भी एक प्रकार से हिंसा ही है।

जहाँ पर तुम दुर्बल वर्ग को सहारा दे सकते हो और देते नहीं हो, तो प्रकृतिसत्ता तुम्हें भी सहारा नहीं देगी। मैं सभी वर्गों का आवाहन करता हूँ कि वे आएं और भगवती मानव कल्याण संगठन के साथ जुड़कर युग परिवर्तन की इस यात्रा में साथ चलें।

आज सांस्कृतिक पतन इस कदर हो चुका है कि दशहरा पर्व के स्थान पर वैलेण्टाईन डे अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। हमारे संगठन में नये वर्ष के स्वागत के लिए 24 घण्टे के अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा का पाठ होता है। मेरा जन्म 09 दिसम्बर, 1960 को हुआ था। अत: जो लोग मेरा जन्मदिन मनाना चाहते हैं, उनके लिए मेरा निर्देश है कि उस दिन चौबीस घण्टे का या 5 घण्टे का अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ ही करायें। सही अर्थों में यही मेरा जन्मोत्सव होगा।

रत्न-अगूंठियों के चक्कर में बिल्कुल मत पड़ो। माता भगवती की आराधना से सभी ग्रह शान्त हो जाते हैं। आध्यात्मिक पूंजी का संग्रह करके तो देखो।

अहिंसा का पाठ भगवान् श्रीराम और भगवान् श्रीकृष्ण ने भी समाज को पढ़ाया है, किन्तु श्रीराम ने रावण का और श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। अन्याय और अधर्म के विरुद्ध हिंसा करना पाप नहीं है। हम भी विशुद्ध अहिंसक नहीं हैं। आज मनुष्योचित मर्यादा के कारण हम किसी का वध तो नहीं करते, किन्तु उसके अल्पायु होने की 'माँ से प्रार्थना तो कर ही सकते हैं।

मैं कहता हूँ मैंने अपनी इष्ट माता भगवती आदिशक्ति जगत जननी जगदम्बा के दर्शन किये हैं और हर पल करता हूँ। अगर किसी और ने किये हैं, तो सत्यपरीक्षण के लिए सामने आये। यदि उनमें शक्ति है, तो मेरी चुनौती स्वीकार करें। आज उन्हें जेल में होना चाहिये था, किन्तु वे सम्मानित जीवन जी रहे हैं। सैकड़ों राजनेताओं के ऊपर भ्रष्टाचार के प्रकरण चल रहे हैं, चरित्रहीनता के केस हैं, किन्तु कहीं भी कुछ नहीं हो रहा है।

आज हमारी संसद गिरवी रखी है। वह अधर्मी-अन्यायियों के कब्जे में है। हमें उसे मुक्त कराना है। मुझे कोई चुनाव लड़कर कोई पद लेना है, इस भ्रम में कोई न रहे। मेरा तो अग्रिपथ है। किन्तु, राजनीति को सही दिशा देना मेरा धर्म है। इसलिए, जल्दी ही मेरे द्वारा एक राजनैतिक दल का गठन किया जायेगा। इस मंच से आज मैं यह भविष्यवाणी कर रहा हूँ कि आने वाले समय में कोई शक्तिसाधिका या शक्तिसाधक ही लाल किले पर तिरंगा फहराएगा।

सदैव सत्य के रक्षक बनो। यह अहंकार नहीं है। मैं यदि अहंकारी होता, तो अन्य धर्मगुरुओं की तरह समाज के बीच जाकर अपने आपको पुजवाता। मेरे द्वारा गलत काम के विरुद्ध यदि आवाज उठाई जाती है, तो मैं क्या गलत करता हूँ?

भष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे की मुहिम का मैं समर्थन करता हूँ। वह एक ईमानदार व्यक्ति हैं। मेरे सारे शिष्य उनके साथ खड़े होने को तैयार हैं। किन्तु, उनका एक पार्टी विशेष के विरुद्ध जाना उचित नहीं है। इसके स्थान पर समाज को जगाना चाहिये। खाली लोकपाल बिल पास कराने से सफलता नहीं मिलेगी। हमें सात्त्विक शक्तियों को संगठित करना होगा।

अनीति-अन्याय-अधर्म करना पाप है। इसी प्रकार, अनीति-अन्याय-अधर्म को सहना महापाप है। परिवर्तन आएगा जरूर। इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसे रोकने की क्षमता किसी में नहीं है। माता भगवती से मुझे इच्छामृत्यु का वरदान मिला है। आम आदमी तो क्या, काल में भी मेरे प्राण हरने की क्षमता नहीं है। इसीलिए, मैं निर्भीक होकर सत्य की आवाज उठाता हूँ। सैकड़ों बेईमान संस्थायें मेरे चिन्तन में हैं, जिन्हें समाज के सामने रखा जाएगा और वह इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य होगा।

एक कम्युनिस्ट राजनेत्री ने एक योगगुरु आयुर्वेदाचार्य के खिलाफ सही आवाज उठाई थी, किन्तु उसके लिए असम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया और कराया गया। एक राजनेता ने तो मंच से कहा था कि उसने उस बाबा (योगगुरु) को दवाइयों में हड्डियां मिलाने के आरोप से बचाया था।

हमारा भगवती मानव कल्याण संगठन शासन-प्रशासन का सदैव सहयोगी रहता है। हमारा कहना है कि जहाँ भी उन्हें हमारे सहयोग की आवश्यकता पड़े, हमें बतायें, पर हमें आंखें न दिखायें, नहीं तो हम जवाब देना भी जानते हैं।

जी-जागरण टी.वी. चैनल को भी मेरा सन्देश है। उसने हमारे शिविर के सीधे प्रसारण को बीच-बीच में रोका है। कहा गया कि उस पर दबाव पड़ रहे हैं। यदि इस प्रकार वह सत्य की आवाज को दबाएगा, तो निश्चित रूप से वे प्रकृतिसत्ता से दण्ड पायेंगे। अत: कायरता छोड़, सत्य की आवाज उठायें।

हम अनीति-अन्याय-अधर्म को अब और नहीं सहेंगे। सभी अधर्मी-अन्यायियों से मेरा कहना है कि वे भ्रष्टाचार के रास्ते को छोड़कर ईमानदारी से हमारे साथ आएं और युग परिवर्तन के इस पावन कार्य में अपना योगदान दें। इससे उन्हें असीम आनन्द और शान्ति मिलेगी।

तदुपरान्त, गुरुवरश्री ने सभी को अपना पूर्ण आशीर्वाद समर्पित करके अपनी दिव्य वाणी को विश्राम दिया। अब दिव्य आरती का क्रम सम्पन्न हुआ और सभी ने पंक्तिबद्ध होकर महाराजश्री की चरणपादुकाओं को श्रद्धापूर्वक नमन किया तथा प्रसाद एवं रात्रिभोजन ग्रहण करके अपने-अपने घर को प्रस्थान किया।

इस प्रकार, यह दो दिवसीय दिव्य आयोजन उत्साह एवं हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हो गया। युग परिवर्तन के लिए प्रारम्भ किया गया यह शंखनाद अब घर-घर में तब तक गूंजता रहेगा, जब तक कलिकाल की सारी आसुरी शक्तियां तिरोभूत नहीं हो जातीं। अब यह मात्र समय की बात है। परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् के द्वारा अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध छेड़ा गया यह धर्मयुद्ध हम लोग बिना किसी रक्तपात के सहज ही जीतेंगे। इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं है।

 

ईश्वर दत्त शर्मा