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श्री दुर्गा चालीसा पाठ

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अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ

 

प्रारम्भ दिवस 15 अप्रैल 1997 से अनन्तकाल के लिए अनवरत

यह प्रायः सर्वविदित है कि श्री पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम के रूप में इस धरती पर परम सिद्धाश्रम धाम का अवतरण दिनांक 23 जनवरी सन् 1997 को हुआ था। इससे शहडोल जनपद के ब्यौहारी क्षेत्र में खामडाड़ गांव के अंधियारी नामक जंगल में मंगल हो गया तथा इस वनक्षेत्र का सौभाग्य इतना चमका कि अब यह अंधियारी से उजियारी बन गया है।
ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व, वर्ष 1960 में परम सिद्धाश्रम धाम के संस्थापक-संचालक परमंहस योगेश्वर ब्रह्मर्षि स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज, युग चेतना पुरुष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के रूप में अवतरित हो चुके हैं। वे ही स्वयं श्री पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम के संस्थापक-संचालक हैं।
23 जनवरी सन् 1997 को पावन समधिन नदी के तट पर इस सिद्धाश्रम की स्थापना के उपरान्त, परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने यहां पर अहर्निश ‘माँ’ के गुणगान किये जाने का शुभ संकल्प लिया। उस समय यहां पर भवन के अभाव के कारण एक छप्पर के नीचे ही श्री दुर्गा चालीसा का अखण्ड पाठ दिनांक 15 अपै्रल 1997 से अनवरत अनन्तकाल के लिए प्रारम्भ किया गया था तथा कुछ समय के बाद, इसे वर्तमान अस्थायी अखण्ड श्री दुर्गा चालीसा पाठ मन्दिर में स्थानान्तरित कर दिया गया था।
वर्तमान मंे यहां पर कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। सामने के सुसज्जित मंच पर माता भगवती श्री दुर्गा जी के विभिन्न रूपों की छवियों के साथ अन्य देवताओं की आकर्षक छवियां विराजमान हैं। उनके सामने परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् का दिव्य आसन है, जिस पर आसीन होकर वे नित्यप्रति प्रातः-सायं आरती व ध्यान करते हैं। यह भवन अत्यन्त छोटा होने के कारण प्रायः उत्तरोत्तर बढ़ती लोगों की भीड़ को समायोजित करने में सक्षम नहीं रह गया है। इस कारण, प्रतिदिन सैकड़ों-हजारों लोग चालीसा भवन के बाहर बैठकर ही श्री दुर्गा चालीसा पाठ का आनन्द लेते हैं। अतः इस अस्थायी भवन के स्थान पर आवश्यक सुविधााअें ये युक्त एक भव्य विशाल चालीसा भवन का निर्माण शीघ्र ही प्रारम्भ किया जाएगा, जिसमें हजारों लोग एक साथ सुखपूर्वक बैठक श्री दुर्गा चालीसा पाठ करने और सुनने का आनन्द ले सकेंगे।
यहां से अहर्निश चल रहे श्री दुर्गा चालीसा पाठ की अविरल धारा ने इस आश्रम के कण-कण में एक अलौकिक ऊर्जा भर दी है। इसका अनुभव कोई भी व्यक्ति समधिन नदी पार करके आश्रम की धरती पर पांव रखते ही करता है। इस अलौकिक ऊर्जा के प्रभाव से यह आश्रम एक ऐसी साधना स्थली बन गया है, जिसका जोड़ वर्तमान में इस धरती पर नहीं है।
श्री दुर्गा चालीसा के इस अखण्ड पाठ का आश्रम में दैनन्दिन आने वाले तीर्थयात्रियों पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। स्त्री-पुरुष-बच्चों में अच्छे संस्कारों का सृज्जन हो रहा है। लोगों में शक्तिचेतना जाग्रत् हो रही है। उन्होंने पूर्ण नशामुक्त एवं मांसाहारमुक्त जीवन जीना प्रारम्भ कर दिया है और छुआछूत, जातपात एवं साम्प्रदायिकता का भेदभाव समाप्त होने लगा है। सभी जाति-धर्म-सम्प्रदायों के लोग यहां पर एक साथ बैठकर श्री दुर्गा चालीसा पाठ करते एवं सुनते हैं।
इसके परिणामस्वरूप, देश के विभिन्न प्रान्तों के जिलों में शक्तिचेतना जनजागरण के उत्साहवर्द्धक समाचार आ रहे हैं। इस प्रकार युग परिवर्तन का चक्र चल रहा है। परम पूज्य गुरुवरश्री का कहना है कि जनजागरण का यह प्रवाह अब चल पड़ा है और इसे दुनिया की कोई शक्ति रोक नहीं पाएगी। जिस गति से जनजागरण का कार्य चल रहा है, उससे यह आशा बलवती होती है कि वह दिन अब दूर नहीं है, जब ‘माँ’ का परचम पूरे विश्व में लहराएगा। इसकी शुरूआत पहले ही पड़ौसी देश नेपाल से हो चुकी है। वहां पर भी जनजागरण का कार्य उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।
आज के व्यस्त जीवन में श्री दुर्गा चालीसा अखण्ड पाठ हेतु हर किसी के लिए चौबीस घण्टे का समय निकालना आसान नहीं है। अतः माता भगवती की दिव्य प्रेरणा एवं असीम आशीर्वाद से परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् ने समाज को पांच घण्टे का अखण्ड पाठ भी प्रदान किया है, जो जनजागरण के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
श्री दुर्गा चालीसा अखण्ड पाठ के माध्यम से अब तक लाखों परिवार पूर्ण रूप से नशामुक्त एवं मांसाहारमुक्त हो चुके हैं। पहले अधिकांश घरों में प्रायः कलह-क्लेश रहता था और वे नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे थे। किन्तु, अब वहां का वातावरण पूर्ण सात्त्विक हो गया है, उन घरों में खुशहाली लौट आई है और वे धरती पर स्वर्ग का आनन्द ले रहे हैं।
श्री दुर्गा चालीसा पाठ करते समय, मेरुदण्ड सीधी करके बैठना चाहिए तथा पूरी चैतन्यता एवं तन्मयता के साथ मन लगाकर पाठ करना चाहिए। उस समय चालीसा पाठ की प्रत्येक पंक्ति के प्रत्येक शब्द एवं उसके अर्थ पर ध्यान रहना चाहिये तथा तदनुसार ही हमारे भाव भी चलने चाहियें, तभी यह पाठ पूर्ण फलदायी होता है। शरीर में आलस्य के रहते अनमने भाव से भारस्वरूप पाठ करने का कुछ लाभ नहीं होता। इसीलिये, इसे रोचक एवं सुरुचिपूर्ण बनाने के लिए चालीसा भवन में हार्मोनियम, ढोलक, मंजीरे आदि कुछ वाद्य यन्त्र रखे हैं। उनकी संगत में जब यह पाठ किया जाता है, तो स्वतः आलस्य भाग जाता है तथा मन हल्का होकर एकाग्र हो जाता है। यदि किसी व्यक्ति को पाठ कण्ठस्थ नहीं है, तो कोई बात नहीं। यदि वह भी मेरुदण्ड सीधी करके बैठे और पूरी चेतनता एवं एकाग्रता के साथ पाठ को सुने, तो उसे भी वही लाभ होगा, जो पाठ करने से होता है।
परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान् के अनुसार, श्री दुर्गा चालीसा पाठ का आयोजन नितान्त सादगीपूर्ण ढंग से बिना किसी टीमटाम अथवा आडम्बर के व कम खर्च में किया जाना चाहिये। इस अवधि में आगन्तुकों के स्वागत-सत्कार में समय बर्बाद न करके मुख्य ध्यान चालीसा पाठ में ही रहना चाहिये। मंच की सज्जा अवश्य ही उत्कृष्ट होनी चाहिये। इस बीच यदि कोई भी व्यक्ति पान-तम्बाकू आदि नशे का सेवन करके चालीसा पाठ में आए, तो उसे तत्काल कुल्ला करके ही बैठने को कहें। यदि वह ऐसा करने से मना करे, तो उसे बैठने की अनुमति न दें, भले ही वह कितना बड़ा क्यों न हो।

गुरुवर जी का कथन है कि इस शरीर का त्याग करने के पश्चात् भी वे सिद्धाश्रम में ही सूक्ष्म रूप में रहेंगे और सदैव उसका संचालन करते रहेंगे। इस प्रकार, ‘माँ‘ का गुणगान भी अनन्तकाल तक चलता रहेगा।

 

श्री दुर्गा चालीसा पाठ

नमो नमो दुर्गे सुखकरनी । नमो नमो अम्बे दुख हरनी।।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहुं लोक फैली उजियारी ।।
शशि ललाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।।
रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ।।
तुम संसार शक्तिलय कीन्हां । पालन हेतु अन्न धन दीन्हां ।।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।।
प्रलयकाल सब नाशनहारी । तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ।।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । बह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।।
रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ।।
धरा रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भई फाड़कर खम्भा ।।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो । हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ।।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं । श्री नारायण अंग समाहीं ।।
क्षीर सिंधु में करत विलासा । दयासिंधु दीजै मन आसा ।।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ।।
मातंगी धूमावती माता ।  भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ।।
श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःखनिवारिणी ।।
केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ।।
कर में खप्पर खड्ग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ।।
सोहै अस्त्र और त्रियशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ।।
नगरकोट में तुम्हीं विराजत । तिहुं लोक में डंका बाजत।।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ।।
महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ।।
रूप कराल काली को धारा । सेन सहित तुम तेहि संहारा  ।।
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब । भई सहाय मातु तुम तब-तब ।।
अमरपुरी औरों सब लोका । तव महिमा सब रहैं अशोका ।।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ।।
प्रेम भक्ति से जो नर गावै । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै ।।
ध्यावै तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म मरण ताको छुटि जाई ।।
योगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिनु शक्ति तुम्हारी ।।
शंकर आचारज तप कीन्हों । काम क्रोध जीति सब लीन्हों ।।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ।।
शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछितायो ।।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ।।
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन्ह विलम्बा ।।
मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ।।
आशा तृष्णा निपट सतावे । मोह मदादिक सब विनसावे ।।
शत्रु नाश कीजै महरानी । सुमिरहुँ एकचित तुम्हें भवानी ।।
करहु कृपा हे मातु दयाला । रिद्धि सिद्धि दे करहु निहाला ।।
जब लग जियौं दयाफल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ।।
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै । सब सुख भोग परम पद पावै ।।
देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।। करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।।

 

जय गुरुवर की !  जय माता की !